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Rigveda Mandal 1 / Sukta 16 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/16/9
Devata- इन्द्र: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सेमं नः॒ काम॒मा पृ॑ण॒ गोभि॒रश्वैः॑ शतक्रतो। स्तवा॑म त्वा स्वा॒ध्यः॑॥

सः । इ॒मम् । नः॒ । काम॑म् । आ । पृ॒ण॒ । गोभिः॑ । अश्वैः॑ । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतक्रतो । स्तवा॑म । त्वा॒ । सु॒ऽआ॒ध्यः॑ ॥

Mantra without Swara
सेमं नः काममा पृण गोभिरश्वैः शतक्रतो। स्तवाम त्वा स्वाध्यः॥

सः। इमम्। नः। कामम्। आ। पृण। गोभिः। अश्वैः। शतक्रतो इति शतक्रतो। स्तवाम। त्वा। सुऽआध्यः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 31 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शतक्रतो) असंख्यात कामों को सिद्ध करनेवाले अनन्तविज्ञानयुक्त जगदीश्वर ! जिस (त्वा) आपकी (स्वाध्यः) अच्छे प्रकार ध्यान करनेवाले हम लोग (स्तवाम) नित्य स्तुति करें, (सः) सो आप (गोभिः) इन्द्रिय, पृथिवी, विद्या का प्रकाश और पशु तथा (अश्वैः) शीघ्र चलने और चलानेवाले अग्नि आदि पदार्थ वा घोड़े हाथी आदि से (नः) हमारी (कामम्) कामनाओं को (आपृण) सब ओर से पूरण कीजिये॥९॥
Essence
ईश्वर में यह सामर्थ्य सदैव रहता है कि पुरुषार्थी धर्मात्मा मनुष्यों का उन के कर्मों के अनुसार सब कामनाओं से पूरण करता है तथा जो संसार में परम उत्तम-उत्तम पदार्थों का उत्पादन तथा धारण करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है, इससे सब मनुष्यों को उसी परमेश्वर की नित्य उपासना करनी चाहिये॥९॥ऋतुओं के सम्पादक जो कि सूर्य्य और वायु आदि पदार्थ हैं, उन के यथायोग्य प्रतिपादन से इस पन्द्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ पूर्व सोलहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति समझनी चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी अध्यापक विलसन आदि ने विपरीत वर्णन किया है॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है-