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Rigveda Mandal 1 / Sukta 16 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/16/5
Devata- इन्द्र: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सेमं नः॒ स्तोम॒मा ग॒ह्युपे॒दं सव॑नं सु॒तम्। गौ॒रो न तृ॑षि॒तः पि॑ब॥

सः । इ॒मम् । नः॒ । स्तोम॑म् । आ । ग॒हि॒ । उप॑ । इ॒दम् । सव॑नम् । सु॒तम् । गौ॒रः । न । तृ॒षि॒तः । पि॒ब॒ ॥

Mantra without Swara
सेमं नः स्तोममा गह्युपेदं सवनं सुतम्। गौरो न तृषितः पिब॥

सः। इमम्। नः। स्तोमम्। आ। गहि। उप। इदम्। सवनम्। सुतम्। गौरः। न। तृषितः। पिब॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो उक्त सूर्य्य (नः) हमारे (इमम्) अनुष्ठान किये हुए (स्तोमम्) प्रशंसनीय यज्ञ वा (सवनम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले क्रियाकाण्ड को (न) जैसे (तृषितः) प्यासा (गौरः) गौरगुणविशिष्ट हरिन (उपागहि) समीप प्राप्त होता है, वैसे (सः) वह (इदम्) इस (सुतम्) उत्पन्न किये ओषधि आदि रस को (पिब) पीता है॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अत्यन्त प्यासे मृग आदि पशु और पक्षी वेग से दौड़कर नदी तालाब आदि स्थान को प्राप्त होके जल को पीते हैं, वैसे ही यह सूर्य्यलोक अपनी वेगवती किरणों से ओषधि आदि को प्राप्त होकर उसके रस को पीता है। सो यह विद्या की वृद्धि के लिये मनुष्यों को यथावत् उपयुक्त करना चाहिये॥५॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में इन्द्र के गुणों का उपदेश किया है-