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Rigveda Mandal 1 / Sukta 16 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/16/4
Devata- इन्द्र: Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ हरि॑भिरिन्द्र के॒शिभिः॑। सु॒ते हि त्वा॒ हवा॑महे॥

उप॑ । नः॒ । सु॒तम् । आ । ग॒हि॒ । हरि॑ऽभिः । इ॒न्द्र॒ । के॒शिऽभिः॑ । सु॒ते । हि । त्वा॒ । हवा॑महे ॥

Mantra without Swara
उप नः सुतमा गहि हरिभिरिन्द्र केशिभिः। सुते हि त्वा हवामहे॥

उप। नः। सुतम्। आ। गहि। हरिऽभिः। इन्द्र। केशिऽभिः। सुते। हि। त्वा। हवामहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(हि) जिस कारण यह (इन्द्र) वायु (केशिभिः) जिनके बहुत से केश अर्थात् किरण विद्यमान हैं, वे (हरिभिः) पदार्थों के हरने वा स्वीकार करनेवाले अग्नि, विद्युत् और सूर्य्य के साथ (नः) हमारे (सुतम्) उत्पन्न किये हुए होम वा शिल्प आदि व्यवहार के (उपागहि) निकट प्राप्त होता है, इससे (त्वा) उसको (सुते) उत्पन्न किये हुए होम वा शिल्प आदि व्यवहारों में हम लोग (हवामहे) ग्रहण करते हैं॥४॥
Essence
जो पदार्थ हम लोगों को शिल्प आदि व्यवहारों में उपकारयुक्त करने चाहियें, वे अग्नि विद्युत् और सूर्य वायु ही के निमित्त से प्रकाशित होते तथा जाते आते हैं॥४॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से वायु के गुणों का उपदेश किया है-