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Rigveda Mandal 1 / Sukta 157 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/157/4
Devata- अश्विनौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ न॒ ऊर्जं॑ वहतमश्विना यु॒वं मधु॑मत्या न॒: कश॑या मिमिक्षतम्। प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑ ॥

आ । नः॒ । ऊर्ज॑म् । व॒ह॒त॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । मधु॑ऽमत्या । नः॒ । कश॑या । मि॒मि॒क्ष॒त॒म् । प्र । आयुः॑ । तारि॑ष्टम् । निः । रपां॑सि । मृ॒क्ष॒त॒म् । सेध॑तम् । द्वेषः॑ । भव॑तम् । स॒चा॒ऽभुवा॑ ॥

Mantra without Swara
आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवं मधुमत्या न: कशया मिमिक्षतम्। प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा ॥

आ। नः। ऊर्जम्। वहतम्। अश्विना। युवम्। मधुऽमत्या। नः। कशया। मिमिक्षतम्। प्र। आयुः। तारिष्टम्। निः। रपांसि। मृक्षतम्। सेधतम्। द्वेषः। भवतम्। सचाऽभुवा ॥ १.१५७.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक ! (युवम्) तुम दोनों (मधुमत्या) बहुत जल वाष्पों के वेगों से युक्त (कशया) गति वा शिक्षा से (नः) हम लोगों के लिये (ऊर्जम्) पराक्रम की (आ, वहतम्) प्राप्ति करो, (मिमिक्षतम्) पराक्रम की प्राप्ति कराने की इच्छा (नः) हमारी (आयुः) उमर को (प्र, तारिष्टम्) अच्छे प्रकार पार पहुँचाओ, (द्वेषः) वैरभावयुक्त (रपांसि) पापों को (निः, सेधतम्) दूर करो, हम लोगों को (मृक्षतम्) शुद्ध करो और हमारे (सचाभुवा) सहकारी (भवतम्) होओ ॥ ४ ॥
Essence
अध्यापक और उपदेशक लोग ऐसी शिक्षा करें कि जिससे हम लोग सबके मित्र होकर पक्षपात से उत्पन्न होनेवाले पापों को छोड़ अभीष्ट सिद्धि पानेवाले हों ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।