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Rigveda Mandal 1 / Sukta 157 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/157/3
Devata- अश्विनौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒र्वाङ्त्रि॑च॒क्रो म॑धु॒वाह॑नो॒ रथो॑ जी॒राश्वो॑ अ॒श्विनो॑र्यातु॒ सुष्टु॑तः। त्रि॒व॒न्धु॒रो म॒घवा॑ वि॒श्वसौ॑भग॒: शं न॒ आ व॑क्षद्द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे ॥

अ॒र्वाङ् । त्रि॒ऽच॒क्रः । म॒धु॒ऽवाह॑नः । रथः॑ । जी॒रऽअ॑श्वः । अ॒श्विनोः॑ । या॒तु॒ । सुऽस्तु॑तः । त्रि॒ऽव॒न्धु॒रः । म॒घऽवा॑ । वि॒श्वऽसौ॑भगः । शम् । नः॒ । आ । व॒क्ष॒त् । द्वि॒ऽपदे॑ । चतुः॑ऽपदे ॥

Mantra without Swara
अर्वाङ्त्रिचक्रो मधुवाहनो रथो जीराश्वो अश्विनोर्यातु सुष्टुतः। त्रिवन्धुरो मघवा विश्वसौभग: शं न आ वक्षद्द्विपदे चतुष्पदे ॥

अर्वाङ्। त्रिऽचक्रः। मधुऽवाहनः। रथः। जीरऽअश्वः। अश्विनोः। यातु। सुऽस्तुतः। त्रिऽवन्धुरः। मघऽवा। विश्वऽसौभगः। शम्। नः। आ। वक्षत्। द्विऽपदे। चतुःऽपदे ॥ १.१५७.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 3

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Meaning
जो (अश्विनोः) विद्वानों की क्रिया में कुशल सज्जनों की उत्तेजना से (सुष्टुतः) सुन्दर प्रशंसित (मधुवाहनः) जल से बहाने योग्य (त्रिचक्रः) जिसमें तीन चक्कर (जीराश्वः) वेगरूप घोड़े और (त्रिबन्धुरः) तीन बन्धन विद्यमान वा (विश्वसौभगः) समस्त सुन्दर ऐश्वर्य भोग जिससे होते वह (अर्वाङ्) नीचले देश अर्थात् जल आदि से चलनेवाला (मघवा) प्रशंसित धनयुक्त (रथः) रथ (नः) हमारे (द्विपदे) द्विपाद मनुष्यादि वा (चतुष्पदे) चौपाद गौ आदि प्राणी के लिये (शम्) सुख का (आ, वक्षत्) आवाहन करावे और हम लोगों को (यातु) प्राप्त हो ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को इस प्रकार प्रयत्न करना चाहिये जिससे पदार्थविद्या से प्रशंसायुक्त यानों को बनाने को समर्थ हों, ऐसे करने के विना समस्त सुख होने को योग्य नहीं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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