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Rigveda Mandal 1 / Sukta 157 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/157/2
Devata- अश्विनौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यद्यु॒ञ्जाथे॒ वृष॑णमश्विना॒ रथं॑ घृ॒तेन॑ नो॒ मधु॑ना क्ष॒त्रमु॑क्षतम्। अ॒स्माकं॒ ब्रह्म॒ पृत॑नासु जिन्वतं व॒यं धना॒ शूर॑साता भजेमहि ॥

यत् । यु॒ञ्जाथे॒ इति॑ । वृष॑णम् । अ॒श्वि॒ना॒ । रथ॑म् । घृ॒तेन॑ । नः॒ । मधु॑ना । क्ष॒त्रम् । उ॒क्ष॒त॒म् । अ॒स्माक॑म् । ब्रह्म॑ । पृत॑नासु । जि॒न्व॒त॒म् । व॒यम् । धना॑ । शूर॑ऽसाता । भ॒जे॒म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
यद्युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम्। अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि ॥

यत्। युञ्जाथे इति। वृषणम्। अश्विना। रथम्। घृतेन। नः। मधुना। क्षत्रम्। उक्षतम्। अस्माकम्। ब्रह्म। पृतनासु। जिन्वतम्। वयम्। धना। शूरऽसाता। भजेमहि ॥ १.१५७.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 27 Mantra » 2

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Meaning
हे (अश्विना) सभा और सेना के अधीशो ! तुम (यत्) जिससे (वृषणम्) शत्रुओं की शक्ति को रोकनेवाले (रथम्) विमान आदि यान को (युञ्जाथे) युक्त करते हो इससे (घृतेन) जल और (मधुना) मधुरादि गुणयुक्त रस से (नः) हम लोगों के (क्षत्रम्) क्षत्रियकुल को (उक्षतम्) सींचो, (अस्माकम्) हमारी (पृतनासु) सेनाओं में (ब्रह्म) ब्राह्मणकुल को (जिन्वतम्) प्रसन्न करो और (वयम्) हम प्रजा सेना जन (शूरसाता) शूरों के सेवने योग्य संग्राम में (धना) धनों को (भजेमहि) सेवन करें ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को राजनीति के अङ्गों से राज्य को रख कर, धनादि को बढ़ाय और संग्रामों को जीत कर सबके लिये सुख की उन्नति करनी चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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