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Rigveda Mandal 1 / Sukta 156 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/156/4
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तम॑स्य॒ राजा॒ वरु॑ण॒स्तम॒श्विना॒ क्रतुं॑ सचन्त॒ मारु॑तस्य वे॒धस॑:। दा॒धार॒ दक्ष॑मुत्त॒मम॑ह॒र्विदं॑ व्र॒जं च॒ विष्णु॒: सखि॑वाँ अपोर्णु॒ते ॥

तम् । अ॒स्य॒ । राजा॑ । वरु॑णः । तम् । अ॒श्विना॑ । क्रतु॑म् । स॒च॒न्त॒ । मारु॑तस्य । वे॒धसः॑ । दा॒धार॑ । दक्ष॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् । अ॒हः॒ऽविद॑म् । व्र्ज॒म् । च॒ । विष्णुः॑ । सखि॑ऽवान् । अ॒प॒ऽऊ॒र्णु॒ते ॥

Mantra without Swara
तमस्य राजा वरुणस्तमश्विना क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस:। दाधार दक्षमुत्तममहर्विदं व्रजं च विष्णु: सखिवाँ अपोर्णुते ॥

तम्। अस्य। राजा। वरुणः। तम्। अश्विना। क्रतुम्। सचन्त। मारुतस्य। वेधसः। दाधार। दक्षम्। उत्ऽतमम्। अहःऽविदम्। व्रजम्। च। विष्णुः। सखिऽवान्। अपऽऊर्णुते ॥ १.१५६.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सखिवान्) बहुत पवनरूप मित्रोंवाला (विष्णुः) अपनी दीप्ति से व्यापक सूर्यमण्डल (उत्तमम्) प्रशंसित (दक्षम्) बल को (दाधार) धारण करे और (अहर्विदम्) जो दिनों को प्राप्त होता अर्थात् जहाँ दिन होता उस (व्रजं, च) प्राप्त हुए देश को (अपोर्णुते) प्रकाशित करता उस (अस्य) इस (मरुतस्य) पवनरूप सखायोंवाले (वेधसः) विधाता सूर्यमण्डल के (तम्) उस (क्रतुम्) कर्म को (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) प्रकाशमान सज्जन और (तम्) उस कर्म को (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक लोग (सचन्त) प्राप्त होवें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे और सज्जन आप्त विद्वान् से विद्या ग्रहण कर उत्तम बुद्धि की उन्नति कर पूरे बल को प्राप्त होते हैं वा जैसे जहाँ-जहाँ सविता अन्धकार को निवृत्त करता है, वैसे वहाँ-वहाँ उस सवितृमण्डल के महत्त्व को देखके समस्त लटे-मोटे, धनी-निर्धनी जन पूर्ण विद्यावाले से विद्या और शिक्षाओं को पाकर अविद्यारूपी अन्धकार को निवृत्त करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।