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Rigveda Mandal 1 / Sukta 156 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/156/3
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तमु॑ स्तोतारः पू॒र्व्यं यथा॑ वि॒द ऋ॒तस्य॒ गर्भं॑ ज॒नुषा॑ पिपर्तन। आस्य॑ जा॒नन्तो॒ नाम॑ चिद्विवक्तन म॒हस्ते॑ विष्णो सुम॒तिं भ॑जामहे ॥

तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्तो॒ता॒रः॒ । पू॒र्व्यम् । यथा॑ । वि॒द । ऋ॒तस्य॑ । गर्भ॑म् । ज॒नुषा॑ । पि॒प॒र्त॒न॒ । आ अ॒स्य॒ । जा॒नन्तः॑ । नाम॑ । चि॒त् । वि॒व॒क्त॒न॒ । म॒हः । ते॒ । वि॒ष्णो॒ इति॑ । सु॒ऽम॒तिम् । भ॒जा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
तमु स्तोतारः पूर्व्यं यथा विद ऋतस्य गर्भं जनुषा पिपर्तन। आस्य जानन्तो नाम चिद्विवक्तन महस्ते विष्णो सुमतिं भजामहे ॥

तम्। ऊँ इति। स्तोतारः। पूर्व्यम्। यथा। विद। ऋतस्य। गर्भम्। जनुषा। पिपर्तन। आ अस्य। जानन्तः। नाम। चित्। विवक्तन। महः। ते। विष्णो इति। सुऽमतिम्। भजामहे ॥ १.१५६.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 3

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Meaning
हे (स्तोतारः) समस्त विद्याओं की स्तुति करनेवाले सज्जनो ! (यथा) जैसे तुम (जनुषा) विद्या जन्म से (पूर्व्यम्) पूर्व विद्वानों ने किये हुए (तम्) उस आप्त अध्यापक विद्वान् को (विद) जानो और (ऋतस्य) सत्य व्यवहार के (गर्भम्) विद्यासम्बन्धी बोध को (उ) तर्क-वितर्क से (पिपर्त्तन) पालो वा विद्याओं से और सेवा से पूरा करो। तथा (अस्य) इसका (चित्) भी (नाम) नाम (आ, जानन्तः) अच्छे प्रकार जानते हुए (विवक्तन) कहो, उपदेश करो वैसे हम लोग भी जानें, पालें और पूरा करें। हे (विष्णो) सकल विद्याओं में व्याप्त विद्वान् ! हम जिन (ते) आपसे (महः) महती (सुमतिम्) सुन्दर बुद्धि को (भजामहे) भजते सेवते हैं सो आप हम लोगों को उत्तम शिक्षा देवें ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य विद्या की वृद्धि के लिये शास्त्रवक्ता अध्यापक को पाकर और उसकी उत्तम सेवा कर सत्यविद्याओं को अच्छे यत्न से ग्रहण करके पूरे विद्वान् हों ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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