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Rigveda Mandal 1 / Sukta 155 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/155/4
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसी॒नस्य॑ त्रा॒तुर॑वृ॒कस्य॑ मी॒ळ्हुष॑:। यः पार्थि॑वानि त्रि॒भिरिद्विगा॑मभिरु॒रु क्रमि॑ष्टोरुगा॒याय॑ जी॒वसे॑ ॥

तत्ऽत॑त् । इत् । अ॒स्य॒ । पौंस्य॑म् । गृ॒णी॒म॒सि॒ । इ॒नस्य॑ । त्रा॒तुः । अ॒वृ॒कस्य॑ । मी॒ळ्हुषः॑ । यः । पार्थि॑वानि । त्रि॒ऽभिः । इत् । विगा॑मऽभिः । उ॒रु । क्रमि॑ष्ट । उ॒रु॒ऽगा॒याय॑ जी॒वसे॑ ॥

Mantra without Swara
तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसीनस्य त्रातुरवृकस्य मीळ्हुष:। यः पार्थिवानि त्रिभिरिद्विगामभिरुरु क्रमिष्टोरुगायाय जीवसे ॥

तत्ऽतत्। इत्। अस्य। पौंस्यम्। गृणीमसि। इनस्य। त्रातुः। अवृकस्य। मीळ्हुषः। यः। पार्थिवानि। त्रिऽभिः। इत्। विगामऽभिः। उरु। क्रमिष्ट। उरुऽगायाय जीवसे ॥ १.१५५.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (विगामभिः) विविध प्रशंसायुक्त (त्रिभिः) तीन सत्व, रजस्, तमोगुणों के साथ (उरुगायाय) बहुत प्रशंसित (जीवसे) जीवन के लिये (पार्थिवानि) पृथिवी के विकारों से उत्पन्न हुए (इत्) ही पदार्थों को (उरु, क्रमिष्ट) क्रम से अत्यन्त प्राप्त होता है (तत्तत्) उस उस (त्रातुः) रक्षा करनेवाले (इनस्य) समर्थ ईश्वर के समान (अस्य) किये हुए ब्रह्मचर्य जितेन्द्रिय इस (अवृकस्य) चोरी आदि दोषरहित (मीढुषः) वीर्य सेचन समर्थ पुरुष के (पौंस्यम्) पुरुषार्थ की (इत्) ही हम लोग (गृणीमसि) प्रशंसा करते हैं ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सुख से चिरकाल तक जीवने के लिये दीर्घ ब्रह्मचर्य को अच्छे प्रकार सेवन कर आरोग्य और धातुओं की समता बढ़ाने से शरीर के बल और विद्या, धर्म तथा योगाभ्यास के बढ़ाने से आत्मबल की उन्नति कर सदैव सुख में रहें। जो लोग इस ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे बाल्यावस्था में स्वयंवर विवाह कभी नहीं करते, इसके विना पूर्ण पुरुषार्थ की वृद्धि की संभावना नहीं है ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।