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Rigveda Mandal 1 / Sukta 155 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/155/3
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ता ईं॑ वर्धन्ति॒ मह्य॑स्य॒ पौंस्यं॒ नि मा॒तरा॑ नयति॒ रेत॑से भु॒जे। दधा॑ति पु॒त्रोऽव॑रं॒ परं॑ पि॒तुर्नाम॑ तृ॒तीय॒मधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥

ताः । ई॒म् । व॒र्ध॒न्ति॒ । महि॑ । अ॒स्य॒ । पौंस्य॑म् । नि । मा॒तरा॑ । न॒य॒ति॒ । रेत॑से । भु॒जे । दधा॑ति । पु॒त्रः । अव॑रम् । पर॑म् । पि॒तुः । नाम॑ । तृ॒तीय॑म् । अधि॑ । रो॒च॒ने । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
ता ईं वर्धन्ति मह्यस्य पौंस्यं नि मातरा नयति रेतसे भुजे। दधाति पुत्रोऽवरं परं पितुर्नाम तृतीयमधि रोचने दिवः ॥

ताः। ईम्। वर्धन्ति। महि। अस्य। पौंस्यम्। नि। मातरा। नयति। रेतसे। भुजे। दधाति। पुत्रः। अवरम्। परम्। पितुः। नाम। तृतीयम्। अधि। रोचने। दिवः ॥ १.१५५.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 3

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Meaning
जो विदुषी स्त्रियाँ (अस्य) इस लड़के के (रेतसे) वीर्य बढ़ाने और (भुजे) भोगादि पदार्थ प्राप्त होने के लिये (महि) अत्यन्त (पौंस्यम्) पुरुषार्थ को (ईम्) सब ओर से (वर्द्धन्ति) बढ़ाती हैं वह (ताः) उनको (नयति) प्राप्त होता है, इसमें कारण यह है कि जिससे (पुत्रः) पुत्र (पितुः) पिता और माता की उत्तेजना से शिक्षा को प्राप्त हुआ (दिवः) प्रकाशमान सूर्यमण्डल के (अधि, रोचने) ऊपरी प्रकाश में (अवरम्) निकृष्ट (परम्) उत्कृष्ट वा पिछले-अगले वा उरले और (तृतीयम्) तीसरे (नाम) नाम को तथा (नि, मातरा) निरन्तर मान करनेवाले माता-पिता को (दधाति) धारण करता है ॥ ३ ॥
Essence
वे ही माता-पिता हितैषी होते हैं, जो अपने सन्तानों को दीर्घ ब्रह्मचर्य से पूरी विद्या, उत्तम शिक्षा और युवावस्था को प्राप्त करा विवाह कराते हैं। वे ही प्रथम ब्रह्मचर्य, दूसरी पूरी विद्या, उत्तम शिक्षा और तृतीय युवावस्था को प्राप्त होकर सूर्य के समान प्रकाशमान होते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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