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Rigveda Mandal 1 / Sukta 155 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/155/2
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्वे॒षमि॒त्था स॒मर॑णं॒ शिमी॑वतो॒रिन्द्रा॑विष्णू सुत॒पा वा॑मुरुष्यति। या मर्त्या॑य प्रतिधी॒यमा॑न॒मित्कृ॒शानो॒रस्तु॑रस॒नामु॑रु॒ष्यथ॑: ॥

त्वे॒षम् । इ॒त्था । स॒म्ऽअर॑णम् । शिमी॑ऽवतोः । इन्द्रा॑विष्णू॒ इति॑ । सु॒त॒ऽपाः । वा॒म् । उ॒रु॒ष्य॒ति॒ । या । मर्त्या॑य । प्र॒ति॒ऽधी॒यमा॑नम् । इत् । कृ॒शानोः॑ । अस्तुः॑ । अ॒स॒नाम् । उ॒रु॒ष्यथः॑ ॥

Mantra without Swara
त्वेषमित्था समरणं शिमीवतोरिन्द्राविष्णू सुतपा वामुरुष्यति। या मर्त्याय प्रतिधीयमानमित्कृशानोरस्तुरसनामुरुष्यथ: ॥

त्वेषम्। इत्था। सम्ऽअरणम्। शिमीऽवतोः। इन्द्राविष्णू इति। सुतऽपाः। वाम्। उरुष्यति। या। मर्त्याय। प्रतिऽधीयमानम्। इत्। कृशानोः। अस्तुः। असनाम्। उरुष्यथः ॥ १.१५५.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (शिमीवतोः) प्रशस्त कर्मयुक्त अध्यापक और उपदेशक की उत्तेजना से (समरणम्) अच्छे प्रकार प्राप्ति करानेवाले (त्वेषम्) प्रकाश को प्राप्त होकर (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (प्रतिधीयमानम्) अच्छे प्रकार धारण किये हुए व्यवहार को (उरुष्यति) बढ़ाता है वह (सुतपाः) सुन्दर तपस्यावाला सज्जन पुरुष (या) जो (इन्द्राविष्णू) बिजुली और सूर्य के समान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले तुम दोनों (अस्तुः) एक देश से दूसरे देश को पदार्थ पहुँचा देनेवाले (कृशानोः) बिजुली रूप आग की (असनाम्) पहुँचाने की क्रिया को जैसे (इत्) ही (उरुष्यथः) सेवते हो (इत्था) इसी प्रकार से (वाम्) तुम दोनों को सेवें ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो तपस्वी जितेन्द्रिय होते हुए विद्या का अभ्यास करते हैं, वे सूर्य और बिजुली के समान प्रकाशितात्मा होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।