Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 155 / Mantra 1

191 Sukta
6 Mantra
1/155/1
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र व॒: पान्त॒मन्ध॑सो धियाय॒ते म॒हे शूरा॑य॒ विष्ण॑वे चार्चत। या सानु॑नि॒ पर्व॑ताना॒मदा॑भ्या म॒हस्त॒स्थतु॒रर्व॑तेव सा॒धुना॑ ॥

प्र । वः॒ । पान्त॑म् । अन्ध॑सः । धि॒या॒ऽय॒ते । म॒हे । शूरा॑य । विष्ण॑वे । च॒ । अ॒र्च॒त॒ । या । सानु॑नि । पर्व॑तानाम् । अदा॑भ्या । म॒हः । त॒स्थतुः॑ । अर्व॑ताऽइव । सा॒धुना॑ ॥

Mantra without Swara
प्र व: पान्तमन्धसो धियायते महे शूराय विष्णवे चार्चत। या सानुनि पर्वतानामदाभ्या महस्तस्थतुरर्वतेव साधुना ॥

प्र। वः। पान्तम्। अन्धसः। धियाऽयते। महे। शूराय। विष्णवे। च। अर्चत। या। सानुनि। पर्वतानाम्। अदाभ्या। महः। तस्थतुः। अर्वताऽइव। साधुना ॥ १.१५५.१

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 25 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (धियायते) प्रज्ञा और धारण की इच्छा करनेवाले (महे) बड़े और (शूराय) शूरता आदि गुणों से युक्त (विष्णवे, च) और शुभ गुणों में व्याप्त महात्मा के लिये (वः) तुम्हारे (अन्धसः) गीले अन्न आदि पदार्थ के (पान्तम्) पान को तुम (प्र, अर्चत) उत्तमता से सत्कार के साथ देओ। तथा (या) जो (अदाभ्या) हिंसा न करने योग्य मित्र और वरुण अर्थात् अध्यापक और उपदेशक (पर्वतानाम्) पर्वतों के (सानुनि) शिखर पर (अर्वतेव) जानेवाले घोड़े के समान (साधुना) उत्तम सिखाये हुए शिष्य से (महः) बड़ा जैसे हो वैसे (तस्थतुः) स्थित होते अर्थात् जैसे घोड़ा से ऊँचे स्थान पर पहुँच जावें वैसे विद्या पढ़ाकर कीर्त्ति के शिखर पर चढ़ जाते हैं, उनका भी उत्तम सत्कार करो ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्यादान, उत्तम शिक्षा और विज्ञान से जनों को वृद्धि देते हैं, वे महात्मा होते हैं ॥ १ ॥
Subject
अब एकसौ पचपनवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में पढ़ाने, उपदेश करनेवाले और ब्रह्मचर्य सेवन का फल कहते हैं ।