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Rigveda Mandal 1 / Sukta 154 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/154/4
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति। य उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

यस्य॑ । त्री । पू॒र्णा । मधु॑ना । प॒दानि॑ । अक्षी॑यमाणा । स्व॒धया॑ । मद॑न्ति । यः । ऊँ॒ इति॑ । त्रि॒ऽधातु॑ । पृ॒थि॒वीम् । उ॒त । द्याम् । एकः॑ । दा॒धार॑ । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य त्री पूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणा स्वधया मदन्ति। य उ त्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ॥

यस्य। त्री। पूर्णा। मधुना। पदानि। अक्षीयमाणा। स्वधया। मदन्ति। यः। ऊँ इति। त्रिऽधातु। पृथिवीम्। उत। द्याम्। एकः। दाधार। भुवनानि। विश्वा ॥ १.१५४.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस ईश्वर के बीच (मधुना) मधुरादि गुण से (पूर्णा) पूर्ण (अक्षीयमाणा) विनाशरहित (त्री) तीन (पदानि) प्राप्त होने योग्य पद अर्थात् लोक (स्वधया) अपने-अपने रूप के धारण करने रूप क्रिया से (मदन्ति) आनन्द को प्राप्त होते हैं (यः) और जो (एकः) (उ) एक अर्थात् अद्वैत परमात्मा (पृथिवीम्) पृथिवीमण्डल (उत) और (द्याम्) सूर्यमण्डल तथा (त्रिधातु) जिनमें सत्त्व, रजस्, तमस् ये तीनों धातु विद्यमान उन (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक-लोकान्तरों को (दाधार) धारण करता है, वही परमात्मा सबको मानने योग्य है ॥ ४ ॥
Essence
जो अनादि कारण से सूर्य आदि के तुल्य प्रकाशमान पृथिवियों को उत्पन्न कर समस्त भोग्य पदार्थों के साथ उनका संयोग करा सबको आनन्दित करता है, उसके गुण कर्म की उपासना से आनन्द ही सबको बढ़ाना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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