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Rigveda Mandal 1 / Sukta 154 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/154/3
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र विष्ण॑वे शू॒षमे॑तु॒ मन्म॑ गिरि॒क्षित॑ उरुगा॒याय॒ वृष्णे॑। य इ॒दं दी॒र्घं प्रय॑तं स॒धस्थ॒मेको॑ विम॒मे त्रि॒भिरित्प॒देभि॑: ॥

प्र । विष्ण॑वे । शू॒षम् । ए॒तु॒ । मन्म॑ । गि॒रि॒ऽक्षिते॑ । उ॒रु॒ऽगा॒याय॑ । वृष्णे॑ । यः । इ॒दम् । दी॒र्घम् । प्रऽय॑तम् । स॒धऽस्थ॑म् । एकः॑ । वि॒ऽम॒मे । त्रि॒ऽभिः । इत् । प॒देऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
प्र विष्णवे शूषमेतु मन्म गिरिक्षित उरुगायाय वृष्णे। य इदं दीर्घं प्रयतं सधस्थमेको विममे त्रिभिरित्पदेभि: ॥

प्र। विष्णवे। शूषम्। एतु। मन्म। गिरिऽक्षिते। उरुऽगायाय। वृष्णे। यः। इदम्। दीर्घम्। प्रऽयतम्। सधऽस्थम्। एकः। विऽममे। त्रिऽभिः। इत्। पदेऽभिः ॥ १.१५४.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (एकः) एक (इत्) ही परमात्मा (त्रिभिः) तीन अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म, अति सूक्ष्म (पदेभिः) जानने योग्य अंशों से (इदम्) इस (दीर्घम्) बढ़े हुए (प्रयतम्) उत्तम यत्नसाध्य (सधस्थम्) सिद्धान्तावयवों से एक साथ के स्थान को (प्रविममे) विशेषता से रचता है उस (वृष्णे) अनन्त पराक्रमी (गिरिक्षिते) मेघ वा पर्वतों को अपने अपने में स्थिर रखनेवाले (उरुगायाय) बहुत प्राणियों से वा बहुत प्रकारों से प्रशंसित (विष्णवे) व्यापक परमात्मा के लिये (मन्म) विज्ञान (शूषम्) और बल (एतु) प्राप्त होवे ॥ ३ ॥
Essence
कोई भी अनन्त पराक्रमी जगदीश्वर के विना इस विचित्र जगत् के रचने, धारण करने और प्रलय करने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इसको छोड़ और की उपासना किसी को न करनी चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।