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Rigveda Mandal 1 / Sukta 154 / Mantra 2

191 Sukta
6 Mantra
1/154/2
Devata- विष्णुः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र तद्विष्णु॑: स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः। यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

प्र । तत् । विष्णुः॑ । स्त॒व॒ते॒ । वी॒र्ये॑ण । मृ॒गः । न । भी॒मः । कु॒च॒रः । गि॒रि॒ऽस्थाः । यस्य॑ । उ॒रुषु॑ । त्रि॒षु । वि॒ऽक्रम॑णेषु । अ॒धि॒ऽक्षि॒यन्ति॑ । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
प्र तद्विष्णु: स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः। यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥

प्र। तत्। विष्णुः। स्तवते। वीर्येण। मृगः। न। भीमः। कुचरः। गिरिऽस्थाः। यस्य। उरुषु। त्रिषु। विऽक्रमणेषु। अधिऽक्षियन्ति। भुवनानि। विश्वा ॥ १.१५४.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस जगदीश्वर के निर्माण किये हुए (उरुषु) विस्तीर्ण (त्रिषु) जन्म, नाम और स्थान इन तीन (विक्रमणेषु) विविध प्रकार के सृष्टि-क्रमों में (विश्वा) समस्त (भुवनानि) लोक-लोकान्तर (अधिक्षियन्ति) आधाररूप से निवास करते हैं (तत्) वह (विष्णुः) सर्वव्यापी परमात्मा अपने (वीर्येण) पराक्रम से (कुचरः) कुटिलगामी अर्थात् ऊँचे-नीचे नाना प्रकार विषम स्थलों में चलने और (गिरिष्ठाः) पर्वत कन्दराओ में स्थिर होनेवाले (मृगः) हरिण के (न) समान (भीमः) भयङ्कर है और समस्त लोक-लोकान्तरों को (प्रस्तवते) प्रशंसित करता है ॥ २ ॥
Essence
कोई भी पदार्थ ईश्वर और सृष्टि के नियम को उल्लङ्घ नहीं सकता है, जो धार्मिक जनों को मित्र के समान आनन्द देने, दुष्टों को सिंह के समान भय देने और न्यायादि गुणों का धारण करनेवाला परमात्मा है, वही सबका अधिष्ठाता और न्यायाधीश है, यह जानना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।