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Rigveda Mandal 1 / Sukta 153 / Mantra 4

191 Sukta
4 Mantra
1/153/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त वां॑ वि॒क्षु मद्या॒स्वन्धो॒ गाव॒ आप॑श्च पीपयन्त दे॒वीः। उ॒तो नो॑ अ॒स्य पू॒र्व्यः पति॒र्दन्वी॒तं पा॒तं पय॑स उ॒स्रिया॑याः ॥

उ॒त । वा॒म् । वि॒क्षु । मद्या॑सु । अन्धः॑ । गावः॑ । आपः॑ । च॒ । पी॒प॒य॒न्त॒ । दे॒वीः । उ॒तो इति॑ । नः॒ । अ॒स्य । पू॒र्व्यः । पतिः॑ । दन् । वी॒तम् । पा॒तम् । पय॑सः । उ॒स्रिया॑याः ॥

Mantra without Swara
उत वां विक्षु मद्यास्वन्धो गाव आपश्च पीपयन्त देवीः। उतो नो अस्य पूर्व्यः पतिर्दन्वीतं पातं पयस उस्रियायाः ॥

उत। वाम्। विक्षु। मद्यासु। अन्धः। गावः। आपः। च। पीपयन्त। देवीः। उतो इति। नः। अस्य। पूर्व्यः। पतिः। दन्। वीतम्। पातम्। पयसः। उस्रियायाः ॥ १.१५३.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 4

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Meaning
हे मित्र और वरुण श्रेष्ठ जन ! जैसे (देवीः) दिव्य (गावः) वाणी (आपः, च) और जल (मद्यासु) हर्षित करने योग्य (विक्षु) प्रजाजनों में (वाम्) तुम दोनों को (पीपयन्त) उन्नति देते हैं (उत) और (अन्धः) अन्न अच्छे प्रकार देवें (उतो) और (पूर्व्यः) पूर्वजों ने नियत किया हुआ (पतिः) पालना करनेवाला (नः) हमारे (अस्य) पढ़ाने के काम सम्बन्धी (उस्रियायाः) दुग्ध देनेवाली गौ के (पयसः) दूध को (दन्) देता हुआ वर्त्तमान है, वैसे तुम दोनों विद्या को (वीतम्) व्याप्त होओ और दुग्ध (पातम्) पिओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यहाँ गौओं के समान सुख देनेवाले और प्राण के समान प्रिय प्रजाजनों में वर्त्तमान हैं, वे इस संसार में अतुल आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥इस सूक्त में मित्र और वरुण के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह एकसौ त्रेपनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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