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Rigveda Mandal 1 / Sukta 153 / Mantra 3

191 Sukta
4 Mantra
1/153/3
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पी॒पाय॑ धे॒नुरदि॑तिर्ऋ॒ताय॒ जना॑य मित्रावरुणा हवि॒र्दे। हि॒नोति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑ सप॒र्यन्त्स रा॒तह॑व्यो॒ मानु॑षो॒ न होता॑ ॥

पी॒पाय॑ । धे॒नुः । अदि॑तिः । ऋ॒ताय॑ । जना॑य । मि॒त्रा॒व॒रु॒णा॒ । ह॒विः॒ऽदे । हि॒नोति॑ । यत् । वा॒म् । वि॒दथे॑ । स॒प॒र्यन् । सः । रा॒तऽह॑व्यः । मानु॑षः । न । होता॑ ॥

Mantra without Swara
पीपाय धेनुरदितिर्ऋताय जनाय मित्रावरुणा हविर्दे। हिनोति यद्वां विदथे सपर्यन्त्स रातहव्यो मानुषो न होता ॥

पीपाय। धेनुः। अदितिः। ऋताय। जनाय। मित्रावरुणा। हविःऽदे। हिनोति। यत्। वाम्। विदथे। सपर्यन्। सः। रातऽहव्यः। मानुषः। न। होता ॥ १.१५३.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 23 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मित्रावरुणा) सत्य उपदेश करनेवाले मित्रावरुणो ! (यत्) जो (अदितिः) अखण्डित, विनाश को नहीं प्राप्त हुई (धेनुः) दूध देनेवाली गौ के समान (हविर्दे) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को देता उस (ऋताय) सत्य व्यवहार को प्राप्त हुए (जनाय) प्रसिद्ध विद्वान् के लिये (सुम्नम्) सुख को (पीपाय) बढ़ाता और (विदथे) विज्ञान के निमित्त (वाम्) तुम दोनों की (सपर्यन्) सेवा करता हुआ (रातहव्यः) जिसने ग्रहण करने योग्य पदार्थ दिये वह (होता) लेनेवाले (मानुषः) मनुष्य के (न) समान (हिनोति) वृद्धि को प्राप्त कराता है और (सः) वह जन उत्तम होता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्या देने-लेने में कुशल, पढ़ाने और उपदेश करनेवाले सबको उन्नति देते हैं, वे शुभ गुणों से सबके अधिक उन्नति को पाते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।