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Rigveda Mandal 1 / Sukta 152 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/152/5
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒न॒श्वो जा॒तो अ॑नभी॒शुरर्वा॒ कनि॑क्रदत्पतयदू॒र्ध्वसा॑नुः। अ॒चित्तं॒ ब्रह्म॑ जुजुषु॒र्युवा॑न॒: प्र मि॒त्रे धाम॒ वरु॑णे गृ॒णन्त॑: ॥

अ॒न॒श्वः । ज॒तः । अ॒न॒भी॒शुः । अर्वा॑ । कनि॑क्रदत् । प॒त॒य॒त् । ऊ॒र्ध्वऽसा॑नुः । अ॒चित्त॑म् । ब्रह्म॑ । जु॒जु॒षुः॒ । युवा॑नः । प्र । मि॒त्रे । धाम॑ । वरु॑णे । गृ॒णन्तः॑ ॥

Mantra without Swara
अनश्वो जातो अनभीशुरर्वा कनिक्रदत्पतयदूर्ध्वसानुः। अचित्तं ब्रह्म जुजुषुर्युवान: प्र मित्रे धाम वरुणे गृणन्त: ॥

अनश्वः। जतः। अनभीशुः। अर्वा। कनिक्रदत्। पतयत्। ऊर्ध्वऽसानुः। अचित्तम्। ब्रह्म। जुजुषुः। युवानः। प्र। मित्रे। धाम। वरुणे। गृणन्तः ॥ १.१५२.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (युवानः) युवावस्था को प्राप्त जन (अनभीशुः) नियम करनेवाली किरणों से रहित (अनश्वः) जिसके जल्दी चलनेवाले घोड़े नहीं (कनिक्रदत्) और बार-बार शब्द करता वा (पतयत्) गमन करता हुआ (जातः) प्रसिद्ध हुआ और (ऊर्ध्वसानुः) जिसके ऊपर को शिखा (अर्वा) प्राप्त होनेवाले सूर्य्य के समान (मित्रे) मित्र वा (वरुणे) उत्तम जन के निमित्त (धाम) स्थान की (गृणन्तः) प्रशंसा करते हुए (अचित्तम्) चित्तरहित (ब्रह्म) वृद्धि को प्राप्त धन आदि पदार्थों से युक्त अन्न को (प्र, जुजुषुः) सेवें, वे बलवान् होते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे घोड़े वा रथ आदि सवारी से रहित आकाश के बीच ऊपर को स्थित सूर्य ईश्वर के अवलम्ब से प्रकाशमान होता है, वैसे विद्वानों की विद्या के आधारभूत मनुष्य बहुत धन और अन्न को पाकर धर्मयुक्त व्यवहार में विराजमान होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।