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Rigveda Mandal 1 / Sukta 152 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/152/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र॒यन्त॒मित्परि॑ जा॒रं क॒नीनां॒ पश्या॑मसि॒ नोप॑नि॒पद्य॑मानम्। अन॑वपृग्णा॒ वित॑ता॒ वसा॑नं प्रि॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑ ॥

प्र॒ऽयन्त॑म् । इत् । परि॑ । जा॒रम् । क॒नीना॑म् । पश्या॑मसि । न । उ॒प॒ऽनि॒पद्य॑मानम् । अन॑वऽपृग्णा । विऽत॑ता । वसा॑नम् । प्रि॒यम् । मि॒त्रस्य॑ । वरु॑णस्य । धाम॑ ॥

Mantra without Swara
प्रयन्तमित्परि जारं कनीनां पश्यामसि नोपनिपद्यमानम्। अनवपृग्णा वितता वसानं प्रियं मित्रस्य वरुणस्य धाम ॥

प्रऽयन्तम्। इत्। परि। जारम्। कनीनाम्। पश्यामसि। न। उपऽनिपद्यमानम्। अनवऽपृग्णा। विऽतता। वसानम्। प्रियम्। मित्रस्य। वरुणस्य। धाम ॥ १.१५२.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (कनीनाम्) कामना करती हुई प्रजाओं की (जारम्) अवस्था हरनेवाले (प्रयन्तम्) अच्छे यत्न करते (उपनिपद्यमानम्) समीप प्राप्त होते (अनवपृग्णा) सम्बन्धरहित अर्थात् अलग के पदार्थ जो (वितता) विथरे हैं, उनको (वसानम्) आच्छादन करते अर्थात् अपने प्रकाश से प्रकाशित करते हुए सूर्य के समान (मित्रस्य) मित्र वा (वरुणस्य) श्रेष्ठ विद्वान् के (इत्) ही (प्रियम्) प्रिय (धाम) सुखसाधक घर को (परि, पश्यामसि) देखते हैं इससे विरुद्ध (न) न हों वैसे तुम भी इसको प्राप्त होओ ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्य लोग जैसे रात्रियों के निहन्ता अपने प्रकाश का विस्तार करते हुए सूर्य को देख कर कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे अविद्यान्धकार का नाश और विद्या का प्रकाश करनेवाले आप्त अध्यापक और उपदेशक के सङ्ग को पाकर क्लेशों को नष्ट करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

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