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Rigveda Mandal 1 / Sukta 152 / Mantra 2

191 Sukta
7 Mantra
1/152/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒तच्च॒न त्वो॒ वि चि॑केतदेषां स॒त्यो मन्त्र॑: कविश॒स्त ऋघा॑वान्। त्रि॒रश्रिं॑ हन्ति॒ चतु॑रश्रिरु॒ग्रो दे॑व॒निदो॒ ह प्र॑थ॒मा अ॑जूर्यन् ॥

ए॒तत् । च॒न । त्वः॒ । वि । चि॒के॒त॒त् । ए॒षा॒म् । स॒त्यः । मन्त्रः॑ । क॒वि॒ऽश॒स्तः । ऋघा॑वान् । त्रिः॒ऽअश्रि॑म् । ह॒न्ति॒ । चतुः॑ऽअश्रिः । उ॒ग्रः । दे॒व॒ऽनिदः॑ । ह॒ । प्र॒थ॒माः । अ॒जू॒र्य॒न् ॥

Mantra without Swara
एतच्चन त्वो वि चिकेतदेषां सत्यो मन्त्र: कविशस्त ऋघावान्। त्रिरश्रिं हन्ति चतुरश्रिरुग्रो देवनिदो ह प्रथमा अजूर्यन् ॥

एतत्। चन। त्वः। वि। चिकेतत्। एषाम्। सत्यः। मन्त्रः। कविऽशस्तः। ऋघावान्। त्रिःऽअश्रिम्। हन्ति। चतुःऽअश्रिः। उग्रः। देवऽनिदः। ह। प्रथमाः। अजूर्यन् ॥ १.१५२.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(त्वः) कोई ही (एषाम्) इन विद्वानों में ऐसा है, जो कि (ऋघावान्) बहुत स्तुति और सत्य असत्य की विवेचना करनेवाली मतियों से युक्त (कविशस्तः) मेधावी कवियों ने प्रशंसित किया (सत्यः) अव्यभिचारी (मन्त्रः) विचार है (एतत्) इसको (विचिकेतत्) विशेषता से जानता है और जो (चतुरश्रिः) चारों वेदों को प्राप्त होता वह (उग्रः) तीव्र स्वभाववाला (देवनिदः) जो विद्वानों की निन्दा करते हैं उनको (हन्ति) मारता और (त्रिरश्रिम्) जो तीनों अर्थात् वाणी, मन और शरीर से प्राप्त किया जाता है ऐसे उत्तम पदार्थ को जानता है, उक्त वे सब (प्रथमाः) आदिम अर्थात् अग्रगामी अगुआ (ह) ही हैं और वे प्रथम (चन) ही (अजूर्यन्) बुड्ढे होते हैं ॥ २ ॥
Essence
जो मनुष्य विद्वानों की निन्दा को छोड़ निन्दकों को निवार के सत्य ज्ञान को प्राप्त हो सत्य विद्याओं को पढ़ाते हुए और सत्य का उपदेश करते हुए विस्तृत सुख को प्राप्त होते हैं, वे धन्य हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।