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Rigveda Mandal 1 / Sukta 151 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/151/9
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
रे॒वद्वयो॑ दधाथे रे॒वदा॑शाथे॒ नरा॑ मा॒याभि॑रि॒तऊ॑ति॒ माहि॑नम्। न वां॒ द्यावोऽह॑भि॒र्नोत सिन्ध॑वो॒ न दे॑व॒त्वं प॒णयो॒ नान॑शुर्म॒घम् ॥

रे॒वत् । वयः॑ । द॒धा॒थे॒ । रे॒वत् । आ॒शा॒थे॒ इति॑ । नरा॑ । मा॒याभिः॑ । इ॒तःऽऊ॑ति । माहि॑नम् । न । वा॒म् । द्यावः॑ । अह॑ऽभिः । न । उ॒त । सिन्ध॑वः । न । दे॒व॒ऽत्वम् । प॒णयः॑ । न । आ॒न॒शुः॒ । म॒घम् ॥

Mantra without Swara
रेवद्वयो दधाथे रेवदाशाथे नरा मायाभिरितऊति माहिनम्। न वां द्यावोऽहभिर्नोत सिन्धवो न देवत्वं पणयो नानशुर्मघम् ॥

रेवत्। वयः। दधाथे। रेवत्। आशाथे इति। नरा। मायाभिः। इतःऽऊति। माहिनम्। न। वाम्। द्यावः। अहऽभिः। न। उत। सिन्धवः। न। देवऽत्वम्। पणयः। न। आनशुः। मघम् ॥ १.१५१.९

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरा) अग्रगामी जनो ! जो तुम (मायाभिः) मानने योग्य बुद्धियों से (माहिनम्) अत्यन्त पूज्य और बड़ा भी (इतऊति) इधर से रक्षा जिससे उस (वयः) अति रम्य मनोहर (रेवत्) प्रशंसित धनयुक्त ऐश्वर्य को (दधाथे) धारण करते हो और (रेवत्) बहुत ऐश्वर्ययुक्त व्यवहार को (आशाथे) प्राप्त होते हो उन (वाम्) आपकी (देवत्वम्) विद्वत्ता को (द्यावः) प्रकाश (न) नहीं (अहभिः) दिनों के साथ दिन अर्थात् एकतार समय (न) नहीं (उत) और (सिन्धवः) बड़ी-बड़ी नदी-नद (न) नहीं (आनशुः) व्याप्त होते अर्थात् अपने-अपने गुणों से तिरस्कार नहीं कर सकते, जीत नहीं सकते, अधिक नहीं होवे तथा (पणयः) व्यवहार करते हुए जन (मघम्) तुम्हारे महत् ऐश्वर्य को (न) नहीं व्याप्त होते, जीत सकते ॥ ९ ॥
Essence
जिस जिस को विद्वान् प्राप्त करते हैं, उस उस को इतर सामान्य जन प्राप्त नहीं होते, विद्वानों के उपमा विद्वान् ही होते हैं और नहीं होते ॥ ९ ॥इस सूक्त में मित्र-वरुण के लक्षण अर्थात् मित्र-वरुण शब्द से लक्षित अध्यापक और उपदेशक आदि का वर्णन किया, इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ एकावनवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।