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Rigveda Mandal 1 / Sukta 151 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/151/5
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
म॒ही अत्र॑ महि॒ना वार॑मृण्वथोऽरे॒णव॒स्तुज॒ आ सद्म॑न्धे॒नव॑:। स्वर॑न्ति॒ ता उ॑प॒रता॑ति॒ सूर्य॒मा नि॒म्रुच॑ उ॒षस॑स्तक्व॒वीरि॑व ॥

म॒ही । अत्र॑ । म॒हि॒ना । वार॑म् । ऋ॒ण्व॒थः॒ । अ॒रे॒णवः॑ । तुजः॑ । आ । सद्म॑न् । धे॒नवः॑ । स्वर॑न्ति । ताः । उ॒प॒रऽता॑ति । सूर्य॑म् । आ । नि॒ऽम्रुचः॑ । उ॒षसः॑ । त॒क्व॒वीःऽइ॑व ॥

Mantra without Swara
मही अत्र महिना वारमृण्वथोऽरेणवस्तुज आ सद्मन्धेनव:। स्वरन्ति ता उपरताति सूर्यमा निम्रुच उषसस्तक्ववीरिव ॥

मही। अत्र। महिना। वारम्। ऋण्वथः। अरेणवः। तुजः। आ। सद्मन्। धेनवः। स्वरन्ति। ताः। उपरऽताति। सूर्यम्। आ। निऽम्रुचः। उषसः। तक्ववीःऽइव ॥ १.१५१.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे पढ़ाने और उपदेश करनेवाले सज्जनो ! तुम दोनों (तक्ववीरिव) जो सेनाजनों को व्याप्त होता उसके समान (अत्र) इस (मही) पृथिवी में (महिना) बड़प्पन से (उपरताति) मेघों के अवकाशवाले अर्थात् मेघ जिसमें आते-जाते उस अन्तरिक्ष में (सूर्यम्) सूर्यमण्डल को (आ, निम्रुचः) मर्यादा माने निरन्तर गमन करती हुई (उषसः) प्रभात वेलाओं के समान (अरेणवः) जो दुष्टों को नहीं प्राप्त (तुजः) सज्जनों ने ग्रहण की हुई (धेनवः) जो दुग्ध पिलाती हैं वे गौयें (सद्मन्) अपने गोड़ों में (वारम्) स्वीकार करने योग्य (आ, स्वरन्ति) सब ओर से शब्द करती हैं (ताः) उनको (ऋण्वथः) प्राप्त होओ ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे दूध देनेवाली गौयें सब प्राणियों को प्रसन्न करती हैं, वैसे पढ़ाने और उपदेश करनेवाले जन विद्या और उत्तम शिक्षा को अच्छे प्रकार देकर सब मनुष्यों को सुखी करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।