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Rigveda Mandal 1 / Sukta 151 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/151/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यद्ध॒ त्यद्वां॑ पुरुमी॒ळ्हस्य॑ सो॒मिन॒: प्र मि॒त्रासो॒ न द॑धि॒रे स्वा॒भुव॑:। अध॒ क्रतुं॑ विदतं गा॒तुमर्च॑त उ॒त श्रु॑तं वृषणा प॒स्त्या॑वतः ॥

यत् । ह॒ । त्यत् । वा॒म् । पु॒रु॒ऽमी॒ळ्हस्य॑ । सो॒मिनः॑ । प्र । मि॒त्रासः॑ । न । द॒धि॒रे । सु॒ऽआ॒भुवः॑ । अध॑ । क्रतु॑म् । वि॒द॒त॒म् । गा॒तुम् । अर्च॑ते । उ॒त । श्रु॒त॒म् । वृ॒ष॒णा॒ । प॒स्त्य॑ऽवतः ॥

Mantra without Swara
यद्ध त्यद्वां पुरुमीळ्हस्य सोमिन: प्र मित्रासो न दधिरे स्वाभुव:। अध क्रतुं विदतं गातुमर्चत उत श्रुतं वृषणा पस्त्यावतः ॥

यत्। ह। त्यत्। वाम्। पुरुऽमीळ्हस्य। सोमिनः। प्र। मित्रासः। न। दधिरे। सुऽआभुवः। अध। क्रतुम्। विदतम्। गातुम्। अर्चते। उत। श्रुतम्। वृषणा। पस्त्यऽवतः ॥ १.१५१.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषणा) शर आदि की वर्षा कराते, दुष्टों की शक्ति को बाँधते हुए अध्यापक और उपदेशको ! तुम दोनों (पुरुमीढस्य) बहुत गुणों से सींचे हुए (पस्त्यावतः) प्रशंसित घरोंवाले (सोमिनः) बहुत ऐश्वर्ययुक्त सज्जन की (क्रतुम्) बुद्धि को (यत्, ह) जो निश्चय के साथ (स्वाभुवः) उत्तमता से परोपकार में प्रसिद्ध होनेवाले जन (मित्रासः) मित्रों के (न) समान (प्र, दधिरे) अच्छे प्रकार धारण करते (त्यत्) उनकी (गातुम्) स्तुति को (विदतम्) प्राप्त होओ, (अधोत) इसके अनन्तर भी (वाम्) तुम दोनों का (अर्चते) सत्कार करते हुए जन की (श्रुतम्) सुनो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मित्र के समान सब जनों में उत्तम बुद्धि को स्थापन पर विद्याओं का स्थापन करते हैं, वे अच्छे भाग्यशाली होते हैं ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।