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Rigveda Mandal 1 / Sukta 150 / Mantra 2

191 Sukta
3 Mantra
1/150/2
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
व्य॑नि॒नस्य॑ ध॒निन॑: प्रहो॒षे चि॒दर॑रुषः। क॒दा च॒न प्र॒जिग॑तो॒ अदे॑वयोः ॥

वि । अ॒नि॒नस्य॑ । ध॒निनः॑ । प्र॒ऽहो॒षे । चि॒त् । अर॑रुषः । क॒दा । च॒न । प्र॒ऽजिग॑तः । अदे॑वऽयोः ॥

Mantra without Swara
व्यनिनस्य धनिन: प्रहोषे चिदररुषः। कदा चन प्रजिगतो अदेवयोः ॥

वि। अनिनस्य। धनिनः। प्रऽहोषे। चित्। अररुषः। कदा। चन। प्रऽजिगतः। अदेवऽयोः ॥ १.१५०.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 19 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
मैं (अदेवयोः) जो नहीं विद्वान् हैं उनको (प्रजिगतः) जो उत्तमता से निरन्तर प्राप्त होता हुआ (अररुषः) अहिंसक (व्यनिनस्य) विशेषता से प्रशंसित प्राण का निमित्त (धनिनः) बहुत धनयुक्त जन है उसके (प्रहोषे) उसको अच्छे ग्रहण करनेवाले के लिये (कदा, चन) कभी अप्रिय वचन न कहूँ ऐसे (चित्) तू भी मत बोल ॥ २ ॥
Essence
जो अविद्वान् पढ़ाने और उपदेश करनेवालों के सङ्ग को छोड़ विद्वानों का सङ्ग करता है, वह सुखों से युक्त होता है ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।