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Rigveda Mandal 1 / Sukta 15 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/15/8
Devata- द्रविणोदाः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ शृण्वि॒रे। दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे॥

द्र॒वि॒णः॒ऽदाः । द॒दा॒तु॒ । नः॒ । वसू॑नि । यानि॑ । शृ॒ण्वि॒रे । दे॒वेषु॑ । ता । व॒ना॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
द्रविणोदा ददातु नो वसूनि यानि शृण्विरे। देवेषु ता वनामहे॥

द्रविणःऽदाः। ददातु। नः। वसूनि। यानि। शृण्विरे। देवेषु। ता। वनामहे॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 29 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोगों के (यानि) जिन (देवेषु) विद्वान् वा दिव्य सूर्य्य आदि अर्थात् शिल्पविद्या से सिद्ध विमान आदि पदार्थों में (वसूनि) जो विद्या, चक्रवर्त्ति राज्य और प्राप्त होने योग्य उत्तम धन (शृण्विरे) सुनने में आते तथा हम लोग (वनामहे) जिनका सेवन करते हैं, (ता) उनको (द्रविणोदाः) जगदीश्वर (नः) हम लोगों के लिये (ददातु) देवे तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ भौतिक अग्नि भी देता है॥८॥
Essence
परमेश्वर ने इस संसार में जीवों के लिये जो पदार्थ उत्पन्न किये हैं, उपकार में संयुक्त किये हैं, उन पदार्थों से जितने प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष वस्तु से सुख उत्पन्न होते हैं, वे विद्वानों ही के सङ्ग से सुख देनेवाले होते हैं॥८॥
Subject
उक्त अग्नि ही सब पदार्थों का देने वा उनका दिलानेवाला है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-