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Rigveda Mandal 1 / Sukta 15 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/15/4
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह सा॒दया॒ योनि॑षु त्रि॒षु। परि॑ भूष॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑॥

अग्ने॑ । दे॒वान् । इ॒ह । आ । व॒ह॒ । सा॒दय॑ । योनि॑षु । त्रि॒षु । परि॑ । भू॒ष॒ । पिब॑ । ऋ॒तुना॑ ॥

Mantra without Swara
अग्ने देवाँ इहा वह सादया योनिषु त्रिषु। परि भूष पिब ऋतुना॥

अग्ने। देवान्। इह। आ। वह। सादय। योनिषु। त्रिषु। परि। भूष। पिब। ऋतुना॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 4

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Meaning
यह (अग्ने) प्रसिद्ध वा अप्रसिद्ध भौतिक अग्नि (इह) इस संसार में (ऋतुना) ऋतुओं के साथ (त्रिषु) तीन प्रकार के (योनिषु) जन्म, नाम और स्थानरूपी लोकों में (देवान्) श्रेष्ठगुणों से युक्त पदार्थों को (आ वह) अच्छी प्रकार प्राप्त कराता (सादय) स्थापित करता (परिभूष) सब ओर से भूषित करता और सब पदार्थों के रसों को (पिब) पीता है॥४॥
Essence
दाहगुणयुक्त यह अग्नि अपने रूप के प्रकाश से सब ऊपर नीचे वा मध्य में रहनेवाले पदार्थों को अच्छी प्रकार सुशोभित करता, होम और शिल्पविद्या में संयुक्त किया हुआ दिव्य-दिव्य सुखों का प्रकाश करता है॥४॥
Subject
अग्नि भी ऋतुओं का संयोजक होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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