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Rigveda Mandal 1 / Sukta 15 / Mantra 3

191 Sukta
12 Mantra
1/15/3
Devata- त्वष्टा Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒भि य॒ज्ञं गृ॑णीहि नो॒ ग्नावो॒ नेष्टः॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑। त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑॥

अ॒भि । य॒ज्ञम् । गृ॒णी॒हि॒ । नः॒ । ग्रावः॑ । नेष्ट॒रिति॑ । पिब॑ । ऋ॒तुना॑ । त्वम् । हि । र॒त्न॒ऽधा । असि॑ ॥

Mantra without Swara
अभि यज्ञं गृणीहि नो ग्नावो नेष्टः पिब ऋतुना। त्वं हि रत्नधा असि॥

अभि। यज्ञम्। गृणीहि। नः। ग्नावः। नेष्टरिति। पिब। ऋतुना। त्वम्। हि। रत्नऽधा। असि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 3

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Meaning
यह (नेष्टः) शुद्धि और पुष्टि आदि हेतुओं से सब पदार्थों का प्रकाश करनेवाली बिजुली (ऋतुना) ऋतुओं के साथ रसों को (पिब) पीती है तथा (हि) जिस कारण (रत्नधाः) उत्तम पदार्थों की धारण करनेवाली (असि) है, (त्वम्) सो यह (ग्नावः) सब पदार्थों की प्राप्ति करानेहारी (नः) हमारे इस (यज्ञम्) यज्ञ को (अभिगृणीहि) सब प्रकार से ग्रहण करती है, इसलिये तुम लोग इससे सब कार्य्यों को सिद्ध करो॥३॥
Essence
यह जो बिजुली अग्नि की सूक्ष्म अवस्था है, सो सब स्थूल पदार्थों के अवयवों में व्याप्त होकर उनको धारण और छेदन करती है, इसी से यह प्रत्यक्ष अग्नि उत्पन्न होके उसी में विलीन हो जाता है॥३॥
Subject
अब ऋतुओं के साथ विद्युत् अग्नि क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

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