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Rigveda Mandal 1 / Sukta 15 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/15/2
Devata- मरूतः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद्य॒ज्ञं पु॑नीतन। यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः॥

मरु॑तः । पिब॑त । ऋ॒तुना॑ । पो॒त्रात् । य॒ज्ञम् । पू॒नी॒त॒न॒ । यू॒यम् । हि । स्थ । सु॒ऽदा॒न॒वः॒ ॥

Mantra without Swara
मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद्यज्ञं पुनीतन। यूयं हि ष्ठा सुदानवः॥

मरुतः। पिबत। ऋतुना। पोत्रात्। यज्ञम्। पुनीतन। यूयम्। हि। स्थ। सुऽदानवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
ये (मरुतः) पवन (ऋतुना) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ सब रसों को (पिबत) पीते हैं, वे ही (पोत्रात्) अपने पवित्रकारक गुण से (यज्ञम्) उक्त तीन प्रकार के यज्ञ को (पुनीतन) पवित्र करते हैं, तथा (हि) जिस कारण (यूयम्) वे (सुदानवः) पदार्थों के अच्छी प्रकार दिलानेवाले (स्थ) हैं, इससे वे युक्ति के साथ क्रियाओं में युक्त हुए कार्य्यों को सिद्ध करते हैं॥२॥
Essence
ऋतुओं के अनुक्रम से पवनों में भी यथायोग्य गुण उत्पन्न होते हैं, इसीसे वे त्रसरेणु आदि पदार्थों वा क्रियाओं के हेतु होते हैं तथा अग्नि के बीच में सुगन्धित पदार्थों के होमद्वारा वे पवित्र होकर प्राणीमात्र को सुखसंयुक्त करते हैं और वे ही पदार्थों के देने-लेने में हेतु होते हैं॥२॥
Subject
अब ऋतुओं के साथ पवन आदि पदार्थ सब को खींचते और पवित्र करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-