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Rigveda Mandal 1 / Sukta 15 / Mantra 12

191 Sukta
12 Mantra
1/15/12
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गार्ह॑पत्येन सन्त्य ऋ॒तुना॑ यज्ञ॒नीर॑सि। दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

गार्ह॑पत्येन । स॒न्त्य॒ । ऋ॒तुना॑ । य॒ज्ञ॒ऽनीः । अ॒सि॒ । दे॒वान् । दे॒व॒य॒ते । य॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
गार्हपत्येन सन्त्य ऋतुना यज्ञनीरसि। देवान्देवयते यज॥

गार्हपत्येन। सन्त्य। ऋतुना। यज्ञऽनीः। असि। देवान्। देवयते। यज॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 29 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (सन्त्य) क्रियाओं के विभाग में अच्छी प्रकार प्रकाशित होनेवाला भौतिक अग्नि (गार्हपत्येन) गृहस्थों के व्यवहार से (ऋतुना) ऋतुओं के साथ (यज्ञनीः) तीन प्रकार के यज्ञ को प्राप्त करानेवाला (असि) है, सो (देवयते) यज्ञ करनेवाले विद्वान् के लिये शिल्पविद्या में (देवान्) दिव्य व्यवहारों का (यज) संगम करता है॥१२॥
Essence
जो विद्वानों से सब व्यवहाररूप कामों में ऋतु-ऋतु के प्रति विद्या के साथ अच्छी प्रकार प्रयोग किया हुआ अग्नि है, सो मनुष्य आदि प्राणियों के लिये दिव्य सुखों को प्राप्त कराता है॥१२॥जो सब देवों के अनुयोगी वसन्त आदि ऋतु हैं, उनके यथायोग्य गुणप्रतिपादन से चौदहवें सूक्त के अर्थ के साथ इस पन्द्रहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि लोगों ने कुछ का कुछ वर्णन किया है॥
Subject
फिर भी भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-