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Rigveda Mandal 1 / Sukta 149 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/149/4
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒भि द्वि॒जन्मा॒ त्री रो॑च॒नानि॒ विश्वा॒ रजां॑सि शुशुचा॒नो अ॑स्थात्। होता॒ यजि॑ष्ठो अ॒पां स॒धस्थे ॥

अ॒भि । द्वि॒ऽजन्मा॑ । त्री । रो॒च॒नानि॑ । विश्वा॑ । रजां॑सि । शु॒शु॒चा॒नः । अ॒स्था॒त् । होता॑ । यजि॑ष्ठः । अ॒पाम् । स॒धऽस्थे॑ ॥

Mantra without Swara
अभि द्विजन्मा त्री रोचनानि विश्वा रजांसि शुशुचानो अस्थात्। होता यजिष्ठो अपां सधस्थे ॥

अभि। द्विऽजन्मा। त्री। रोचनानि। विश्वा। रजांसि। शुशुचानः। अस्थात्। होता। यजिष्ठः। अपाम्। सधऽस्थे ॥ १.१४९.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे विद्वन् ! जैसे (द्विजन्मा) दो अर्थात् आकाश और वायु से प्रसिद्ध जिसका जन्म ऐसा (होता) आकर्षण शक्ति से पदार्थों को ग्रहण करने और (यजिष्ठः) अतिशय करके सङ्गत होनेवाला अग्नि (अपाम्) जलों के (सधस्थे) साथ के स्थान में (त्री) तीन (रोचनानि) अर्थात् सूर्य, बिजुली और भूमि के प्रकाशों को और (विश्वा) समस्त (रजांसि) लोकों को (शुशुचानः) प्रकाशित करता हुआ (अभ्यस्थात्) सब ओर से स्थित हो रहा है, वैसे तुम होओ ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या और धर्मसंयुक्त व्यवहार में विद्वानों के सङ्ग से प्रकाशित हुए स्थान के निमित्त अनुष्ठान करते हैं, वे समस्त अच्छे गुण, कर्म और स्वभावों के ग्रहण करने के योग्य होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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