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Rigveda Mandal 1 / Sukta 149 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/149/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
आ यः पुरं॒ नार्मि॑णी॒मदी॑दे॒दत्य॑: क॒विर्न॑भ॒न्यो॒३॒॑ नार्वा॑। सूरो॒ न रु॑रु॒क्वाञ्छ॒तात्मा॑ ॥

आ । यः । पुर॑म् । नार्मि॑णीम् । अदी॑देत् । अत्यः॑ । क॒विः । न॒भ॒न्यः॑ । नार्वा॑ । सूरः॑ । न । रु॒रु॒क्वान् । श॒तऽआ॑त्मा ॥

Mantra without Swara
आ यः पुरं नार्मिणीमदीदेदत्य: कविर्नभन्यो३ नार्वा। सूरो न रुरुक्वाञ्छतात्मा ॥

आ। यः। पुरम्। नार्मिणीम्। अदीदेत्। अत्यः। कविः। नभन्यः। नार्वा। सूरः। न। रुरुक्वान्। शतऽआत्मा ॥ १.१४९.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (अत्यः) व्याप्त होनेवाला (नभन्यः) आकाश में प्रसिद्ध पवन उसके (न) समान (कविः) क्रम-क्रम से पदार्थों में व्याप्त होनेवाली बुद्धिवाला वा (अर्वा) घोड़ा और (सूरः) सूर्य के (न) समान (रुरुक्वान्) रुचिमान् (शतात्मा) असंख्यात पदार्थों में विशेष ज्ञान रखनेवाला जन (नार्मिणीम्) क्रीडाविलासी आनन्द भोगनेवाले जनों की (पुरम्) पुरी को (आदीदेत्) अच्छे प्रकार प्रकाशित करे वह न्याय करने योग्य होता है ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो असंख्यात पदार्थों की विद्याओं को जाननेवाला अच्छी शोभायुक्त नगरी को बसावे, वह ऐश्वर्यों से सूर्य के समान प्रकाशमान हो ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।