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Rigveda Mandal 1 / Sukta 149 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/149/2
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स यो वृषा॑ न॒रां न रोद॑स्यो॒: श्रवो॑भि॒रस्ति॑ जी॒वपी॑तसर्गः। प्र यः स॑स्रा॒णः शि॑श्री॒त योनौ॑ ॥

सः । यः । वृषा॑ । न॒रान् । न । रोद॑स्योः । श्रवः॑ऽभिः । अस्ति॑ । जी॒वपी॑तऽसर्गः । प्र । यः । स॒स्रा॒णः । शि॒श्री॒त । योनौ॑ ॥

Mantra without Swara
स यो वृषा नरां न रोदस्यो: श्रवोभिरस्ति जीवपीतसर्गः। प्र यः सस्राणः शिश्रीत योनौ ॥

सः। यः। वृषा। नरान्। न। रोदस्योः। श्रवःऽभिः। अस्ति। जीवपीतऽसर्गः। प्र। यः। सस्राणः। शिश्रीत। योनौ ॥ १.१४९.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 18 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो (श्रवोभिः) अन्न आदि पदार्थों के साथ (नराम्) मनुष्यों के बीच (न) जैसे वैसे (रोदस्योः) आकाश और पृथिवी के बीच (जीवपीतसर्गः) जीवों के साथ पिया है सृष्टिक्रम जिसने अर्थात् विद्या बल से प्रत्येक जीव के गुण-दोषों को उत्पत्ति के साथ जाना वा (यः) जो (सस्राणः) सब पदार्थों के गुण-दोषों को प्राप्त होता हुआ (योनौ) कारण में अर्थात् सृष्टि के निमित्त में (प्र, शिश्रीत) आश्रय करे उसमें आरूढ़ हो (सः) वह (वृषा) श्रेष्ठ बलवान् (अस्ति) है ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नायकों में नायक, पृथिवी आदि पदार्थों के कार्य कारण को जाननेवालों की विद्या का आश्रय करता है, वही सुखी होता है ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।