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Rigveda Mandal 1 / Sukta 148 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/148/5
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न यं रि॒पवो॒ न रि॑ष॒ण्यवो॒ गर्भे॒ सन्तं॑ रेष॒णा रे॒षय॑न्ति। अ॒न्धा अ॑प॒श्या न द॑भन्नभि॒ख्या नित्या॑स ईं प्रे॒तारो॑ अरक्षन् ॥

न । यम् । रि॒पवः॑ । न । रि॒ष॒ण्यवः॑ । गर्भे॑ । सन्त॑म् । रे॒ष॒णाः । रे॒षय॑न्ति । अ॒न्धाः । अ॒प॒श्याः । न । द॒भ॒न् । अ॒भि॒ऽख्या । नित्या॑सः । ई॒म् । प्रे॒तारः॑ । अ॒र॒क्ष॒न् ॥

Mantra without Swara
न यं रिपवो न रिषण्यवो गर्भे सन्तं रेषणा रेषयन्ति। अन्धा अपश्या न दभन्नभिख्या नित्यास ईं प्रेतारो अरक्षन् ॥

न। यम्। रिपवः। न। रिषण्यवः। गर्भे। सन्तम्। रेषणाः। रेषयन्ति। अन्धाः। अपश्याः। न। दभन्। अभिऽख्या। नित्यासः। ईम्। प्रेतारः। अरक्षन् ॥ १.१४८.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यम्) जिसको (रिपवः) शत्रुजन (न) नहीं (रेषयन्ति) नष्ट करा सकते वा (गर्भे, सन्तम्) मध्य में वर्त्तमान जिसको (रेषणाः) हिंसक (रिषण्यवः) अपने को नष्ट होने की इच्छा करनेवाले (न) नष्ट नहीं करा सकते वा (नित्यासः) नित्य अविनाशी (अभिख्या) सब ओर से ख्याति करने और (अपश्याः) न देखनेवालों के (न) समान (अन्धाः) ज्ञानदृष्टिरहित न (दभन्) नष्ट कर सकें जो (प्रेतारः) प्रीति करनेवाले (ईम्) सब ओर से (अरक्षन्) रक्षा करें उस अग्नि को और उनको सब सत्कारयुक्त करें ॥ ५ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसको रिपु जन नष्ट नहीं कर सकते हैं, जो गर्भ में भी नष्ट नहीं होता है, वह आत्मा जानने योग्य है ॥ ५ ॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि आदि पदार्थों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानने योग्य है ॥यह एकसौ अड़तालीसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।