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Rigveda Mandal 1 / Sukta 148 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/148/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नित्ये॑ चि॒न्नु यं सद॑ने जगृ॒भ्रे प्रश॑स्तिभिर्दधि॒रे य॒ज्ञिया॑सः। प्र सू न॑यन्त गृ॒भय॑न्त इ॒ष्टावश्वा॑सो॒ न र॒थ्यो॑ रारहा॒णाः ॥

नित्ये॑ । चि॒त् । नु । यम् । सद॑ने । ज॒गृ॒भ्रे । प्रश॑स्तिऽभिः । द॒धि॒रे । य॒ज्ञिया॑सः । प्र । सु । न॒य॒न्त॒ । गृ॒भय॑न्तः । इ॒ष्टौ । अश्वा॑सः । न । र॒थ्यः॑ । र॒र॒हा॒णाः ॥

Mantra without Swara
नित्ये चिन्नु यं सदने जगृभ्रे प्रशस्तिभिर्दधिरे यज्ञियासः। प्र सू नयन्त गृभयन्त इष्टावश्वासो न रथ्यो रारहाणाः ॥

नित्ये। चित्। नु। यम्। सदने। जगृभ्रे। प्रशस्तिऽभिः। दधिरे। यज्ञियासः। प्र। सु। नयन्त। गृभयन्तः। इष्टौ। अश्वासः। न। रथ्यः। ररहाणाः ॥ १.१४८.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 17 Mantra » 3

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Meaning
(यज्ञियासः) शिल्प यज्ञ के योग्य सज्जन (प्रशस्तिभिः) प्रशंसित क्रियाओं से (नित्ये) नित्य नाशरहित (सदने) बैठें जिस आकाश में और (इष्टौ) प्राप्त होने योग्य क्रिया में (यम्) जिस अग्नि का (जगृभ्रे) ग्रहण करें (चित्) और (नु) शीघ्र (दधिरे) धरें उसके आश्रय से (रारहाणाः) जाते हुए जो कि (रथ्यः) रथों में उत्तम प्रशंसावाले (अश्वासः) अच्छे शिक्षित घोड़े हैं उनके (न) समान और (गृभयन्तः) पदार्थों को ग्रहण करनेवालों के समान आचरण करते हुए रथों को (सु, प्र, नयन्त) उत्तम प्रीति से प्राप्त होवें ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नित्य आकाश में स्थित वायु और अग्नि आदि पदार्थों को उत्तम क्रियाओं से कार्यों में युक्त करते हैं, वे विमान आदि यानों को बना सकते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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