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Rigveda Mandal 1 / Sukta 147 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/147/5
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त वा॒ यः स॑हस्य प्रवि॒द्वान्मर्तो॒ मर्तं॑ म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑। अत॑: पाहि स्तवमान स्तु॒वन्त॒मग्ने॒ माकि॑र्नो दुरि॒ताय॑ धायीः ॥

उ॒त । वा॒ । यः । स॒ह॒स्य॒ । प्र॒ऽवि॒द्वान् । मर्तः॑ । मर्त॑म् । म॒र्चय॑ति । द्व॒येन॑ । अतः॑ । पा॒हि॒ । स्त॒व॒मा॒न॒ । स्तु॒वन्त॑म् । अग्ने॑ । माकिः॑ । नः॒ । दुः॒ऽइ॒ताय॑ । धा॒यीः॒ ॥

Mantra without Swara
उत वा यः सहस्य प्रविद्वान्मर्तो मर्तं मर्चयति द्वयेन। अत: पाहि स्तवमान स्तुवन्तमग्ने माकिर्नो दुरिताय धायीः ॥

उत। वा। यः। सहस्य। प्रऽविद्वान्। मर्तः। मर्तम्। मर्चयति। द्वयेन। अतः। पाहि। स्तवमान। स्तुवन्तम्। अग्ने। माकिः। नः। दुःऽइताय। धायीः ॥ १.१४७.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 16 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्य) बलादिक में प्रसिद्ध होने (स्तवमान) और सज्जनों की प्रशंसा करनेवाले (अग्ने) विद्वान् ! तू (यः) जो (प्रविद्वान्) उत्तमता से जाननेवाला (मर्त्तः) मनुष्य (द्वयेन) अध्यापन और उपदेश रूप से (मर्त्तम्) मनुष्य को (मर्चयति) कहता है अर्थात् प्रशंसित करता है (अतः) इससे (स्तुवन्तम्) स्तुति अर्थात् प्रशंसा करते हुए जन को (पाहि) पालो (उत, वा) अथवा (नः) हम लोगों को (दुरिताय) दुष्ट आचरण के लिये (माकिः) मत कभी (धायीः) धायिये (=पालिये) ॥ ५ ॥
Essence
जो विद्वान् उत्तम शिक्षा और पढ़ाने से मनुष्यों के आत्मिक और शारीरिक बल को बढ़ा के और उनको अविद्या और पाप के आचरण से अलग करते हैं, वे सबकी शुद्धि करनेवाले होते हैं ॥ ५ ॥इस सूक्त में मित्र और अमित्रों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये ॥।एकसौ सैंतालीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।