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Rigveda Mandal 1 / Sukta 146 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/146/4
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धीरा॑सः प॒दं क॒वयो॑ नयन्ति॒ नाना॑ हृ॒दा रक्ष॑माणा अजु॒र्यम्। सिषा॑सन्त॒: पर्य॑पश्यन्त॒ सिन्धु॑मा॒विरे॑भ्यो अभव॒त्सूर्यो॒ नॄन् ॥

धीरा॑सः । प॒दम् । क॒वयः॑ । न॒य॒न्ति॒ । नाना॑ । हृ॒दा । रक्ष॑माणाः । अ॒जु॒र्यम् । सिसा॑सन्तः । परि॑ । अ॒प॒श्य॒न्त॒ । सिन्धु॑म् । आ॒विः । ए॒भ्यः॒ । अ॒भ॒व॒त् । सूर्यः॑ । नॄन् ॥

Mantra without Swara
धीरासः पदं कवयो नयन्ति नाना हृदा रक्षमाणा अजुर्यम्। सिषासन्त: पर्यपश्यन्त सिन्धुमाविरेभ्यो अभवत्सूर्यो नॄन् ॥

धीरासः। पदम्। कवयः। नयन्ति। नाना। हृदा। रक्षमाणाः। अजुर्यम्। सिसासन्तः। परि। अपश्यन्त। सिन्धुम्। आविः। एभ्यः। अभवत्। सूर्यः। नॄन् ॥ १.१४६.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (धीरासः) ध्यानवान् (कवयः) विविध प्रकार के पदार्थों में आक्रमण करनेवाली बुद्धियुक्त विद्वान् (हृदा) हृदय से (नाना) अनेक (नॄन्) मुखियों की (रक्षमाणाः) रक्षा करते और (सिषासन्तः) अच्छे प्रकार विभाग करने की इच्छा करते हुए (सूर्यः) सूर्य के समान अर्थात् जैसे सूर्यमण्डल (सिन्धुम्) नदी के जल को स्वीकार करता वैसे (अजुर्यम्) हानिरहित (पदम्) प्राप्त करने योग्य पद को (नयन्ति) प्राप्त होते हैं वे परमात्मा को (परि, अपश्यन्त) सब ओर से देखते अर्थात् सब पदार्थों में विचारते हैं जो (एभ्यः) इनसे विद्या और उत्तम शिक्षा को पाके (आविः) प्रकट (अभवत्) होता है वह भी उस पद को प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सबको आत्मा के समान सुख-दुःख की व्यवस्था में जान न्याय का ही आश्रय करते हैं वे अव्यय पद को प्राप्त होते हैं। जैसे सूर्य जल को वर्षा कर नदियों को भरता पूरी करता है वैसे विद्वान् जन सत्य वचनों को वर्षा कर मनुष्यों के आत्माओं को पूर्ण करते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।