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Rigveda Mandal 1 / Sukta 146 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/146/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒मा॒नं व॒त्सम॒भि सं॒चर॑न्ती॒ विष्व॑ग्धे॒नू वि च॑रतः सु॒मेके॑। अ॒न॒प॒वृ॒ज्याँ अध्व॑नो॒ मिमा॑ने॒ विश्वा॒न्केताँ॒ अधि॑ म॒हो दधा॑ने ॥

स॒मा॒नम् । व॒त्सम् । अ॒भि । स॒ञ्चर॑न्ती॒ इति॑ स॒म्ऽचर॑न्ती । विष्व॑क् । धे॒नू इति॑ । वि । च॒र॒तः॒ । सु॒मेक्के॒ इति॑ सु॒ऽमेके॑ । अ॒न॒प॒ऽवृ॒ज्यान् । अध्व॑नः । मिमा॑ने॒ इति॑ । विश्वा॑न् । केता॑न् । अधि॑ । म॒हः । दधा॑ने॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
समानं वत्समभि संचरन्ती विष्वग्धेनू वि चरतः सुमेके। अनपवृज्याँ अध्वनो मिमाने विश्वान्केताँ अधि महो दधाने ॥

समानम्। वत्सम्। अभि। सञ्चरन्ती इति सम्ऽचरन्ती। विष्वक्। धेनू इति। वि। चरतः। सुमेके इति सुऽमेके। अनपऽवृज्यान्। अध्वनः। मिमाने इति। विश्वान्। केतान्। अधि। महः। दधाने इति ॥ १.१४६.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे सूर्यलोक और भूमण्डल दोनों (समानम्) तुल्य (वत्सम्) बछड़े के समान वर्त्तमान दिन-रात्रि को (अभि, सं, चरन्ति) सब ओर से अच्छे प्रकार प्राप्त होते हुए (सुमेके) सुन्दर जिनका त्याग करना (अध्वनः) मार्ग से (अनपवृज्यान्) न दूर करने योग्य पदार्थों को (मिमाने) बनावट (=रचना) करनेवाले (महः) बड़े बड़े (विश्वान्) समग्र (केतान्) बोधों को (अधि, दधाने) अधिकता से धारण करते हुए (धेनू) गौओं के समान (विष्वक्, वि, चरतः) सब ओर से विचर रहे हैं, वैसे इन्हें जान, पक्षपात को छोड़, सब कामों को पूरा करो ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान न्याय गुणों के आकर्षण और प्रकाश * करनेवाले, नानाविध मार्गों का निर्माण करते हुए धेनु के समान सबकी पुष्टि करते हुए समग्र विद्याओं को धारण करते हैं, वे दुःखरहित होते हैं ॥ ३ ॥ * गुणों को आकर्षण करनेवालों का प्रकाश- हस्तलेख ॥ सं० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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