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Rigveda Mandal 1 / Sukta 146 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/146/2
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒क्षा म॒हाँ अ॒भि व॑वक्ष एने अ॒जर॑स्तस्थावि॒तऊ॑तिर्ऋ॒ष्वः। उ॒र्व्याः प॒दो नि द॑धाति॒ सानौ॑ रि॒हन्त्यूधो॑ अरु॒षासो॑ अस्य ॥

उ॒क्षा । म॒हान् । अ॒भि । व॒व॒क्षे॒ । ए॒ने॒ इति॑ । अ॒जरः॑ । त॒स्थौ॒ । इ॒तःऽऊ॑तिः । ऋ॒ष्वः । उ॒र्व्याः । प॒दः । नि । द॒धा॒ति॒ । सानौ॑ । रि॒हन्ति॑ । ऊधः॑ । अ॒रु॒षासः॑ । अ॒स्य॒ ॥

Mantra without Swara
उक्षा महाँ अभि ववक्ष एने अजरस्तस्थावितऊतिर्ऋष्वः। उर्व्याः पदो नि दधाति सानौ रिहन्त्यूधो अरुषासो अस्य ॥

उक्षा। महान्। अभि। ववक्षे। एने इति। अजरः। तस्थौ। इतःऽऊतिः। ऋष्वः। उर्व्याः। पदः। नि। दधाति। सानौ। रिहन्ति। ऊधः। अरुषासः। अस्य ॥ १.१४६.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (उर्व्याः) पृथिवी से (महान्) बड़ा (उक्षा) वर्षा जल से सींचनेवाला (अजरः) हानिरहित (ऋष्वः) गतिमान् सूर्यः (एने) इन अन्तरिक्ष और भूमिमण्डल को (अभि, ववक्षे) एकत्र करता है (इतऊतिः) वा जिससे रक्षा आदि क्रिया प्राप्त होतीं ऐसा होता हुआ (पदः) अपने अंशों को (नि, दधाति) निरन्तर स्थापित करता है (अस्य) इस सूर्य की (अरुषासः) नष्ट न करती हुई किरणें (सानौ) अलग-अलग विस्तृत जगत् में (ऊधः) जलस्थान को (रिहन्ति) प्राप्त होती हैं वा जो ब्रह्माण्ड के बीच में (तस्थौ) स्थिर है उसके समान तुम लोग होओ ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूत्रात्मा वायु, भूमि और सूर्यमण्डल को धारण करके संसार की रक्षा करता है वा जैसे सूर्य पृथिवी से बड़ा है, वैसा वर्त्ताव वर्त्तना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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