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Rigveda Mandal 1 / Sukta 145 / Mantra 5

191 Sukta
5 Mantra
1/145/5
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स ईं॑ मृ॒गो अप्यो॑ वन॒र्गुरुप॑ त्व॒च्यु॑प॒मस्यां॒ नि धा॑यि। व्य॑ब्रवीद्व॒युना॒ मर्त्ये॑भ्यो॒ऽग्निर्वि॒द्वाँ ऋ॑त॒चिद्धि स॒त्यः ॥

सः । ई॒म् । मृ॒गः । अप्यः॑ । व॒न॒र्गुः । उप॑ । त्व॒चि । उ॒प॒ऽमस्या॒म् । नि । धा॒यि॒ । वि । अ॒ब्र॒वी॒त् । व॒युना॑ । मर्त्ये॑भ्यः । अ॒ग्निः । वि॒द्वान् । ऋ॒त॒ऽचित् । हि । स॒त्यः ॥

Mantra without Swara
स ईं मृगो अप्यो वनर्गुरुप त्वच्युपमस्यां नि धायि। व्यब्रवीद्वयुना मर्त्येभ्योऽग्निर्विद्वाँ ऋतचिद्धि सत्यः ॥

सः। ईम्। मृगः। अप्यः। वनर्गुः। उप। त्वचि। उपऽमस्याम्। नि। धायि। वि। अब्रवीत्। वयुना। मर्त्येभ्यः। अग्निः। विद्वान्। ऋतऽचित्। हि। सत्यः ॥ १.१४५.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
विद्वानों से जो (अप्यः) जलों के योग्य (वनर्गुः) वनगामी (मृगः) हरिण के समान (उपमस्याम्) उपमा रूप (त्वचि) त्वगिन्द्रिय में (उप, नि, धायि) समीप निरन्तर धरा जाता है वा जो (ऋतचित्) सत्य व्यवहार को इकट्ठा करनेवाला (अग्निः) अग्नि के समान विद्या आदि गुणों से प्रकाशमान (विद्वान्) सब विद्याओं को जाननेवाला पण्डित (मर्त्येभ्यः) मनुष्यों के लिये (वयुना) उत्तम-उत्तम ज्ञानों का (ईम्) ही (वि, अब्रवीत्) विशेष करके उपदेश देता है (सः, हि) वही (सत्यः) सज्जनों में साधु है ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे तृषातुर मृग जल पीने के लिये वन में डोलता-डोलता जल को पाकर आनन्दित होता है वैसे विद्वान् जन शुभ आचरण करनेवाले विद्यार्थियों को पाकर आनन्दित होते हैं और जो शिक्षा पाकर औरों को नहीं देते वे क्षुद्राशय और अत्यन्त पापी होते हैं ॥ ५ ॥इस सूक्त में उपदेश करने और उपदेश सुननेवालों के कर्त्तव्य कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है यह जानना चाहिये ॥यह एकसौ पैंतालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।