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Rigveda Mandal 1 / Sukta 145 / Mantra 3

191 Sukta
5 Mantra
1/145/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तमिद्ग॑च्छन्ति जु॒ह्व१॒॑स्तमर्व॑ती॒र्विश्वा॒न्येक॑: शृणव॒द्वचां॑सि मे। पु॒रु॒प्रै॒षस्ततु॑रिर्यज्ञ॒साध॒नोऽच्छि॑द्रोति॒: शिशु॒राद॑त्त॒ सं रभ॑: ॥

तम् । इत् । ग॒च्छ॒न्ति॒ । जु॒ह्वः॑ । तम् । अर्व॑तीः । विश्वा॑नि । एकः॑ । शृ॒ण॒व॒त् । वचां॑सि । मे॒ । पु॒रु॒ऽप्रै॒षः । ततु॑रिः । य॒ज्ञ॒ऽसाध॑नः । अच्छि॑द्रऽऊतिः । शिशुः॑ । आ । अ॒द॒त्त॒ । सम् । रभः॑ ॥

Mantra without Swara
तमिद्गच्छन्ति जुह्व१स्तमर्वतीर्विश्वान्येक: शृणवद्वचांसि मे। पुरुप्रैषस्ततुरिर्यज्ञसाधनोऽच्छिद्रोति: शिशुरादत्त सं रभ: ॥

तम्। इत्। गच्छन्ति। जुह्वः। तम्। अर्वतीः। विश्वानि। एकः। शृणवत्। वचांसि। मे। पुरुऽप्रैषः। ततुरिः। यज्ञऽसाधनः। अच्छिद्रऽऊतिः। शिशुः। आ। अदत्त। सम्। रभः ॥ १.१४५.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! आप (एकः) अकेले (मे) मेरे (विश्वानि) समस्त (वक्षांसि) वचनों को (शृणवत्) सुनें जो (रभः) बड़ा महात्मा (पुरुप्रैषः) जिसको बहुत सज्जनों ने प्रेरणा दी हो (ततुरिः) जो दुःख से सभों को तारनेवाला (यज्ञसाधनः) विद्वानों के सत्कार जिसके साधन अर्थात् जिसकी प्राप्ति करानेवाले (अच्छिद्रोतिः) जिससे नहीं खण्डित हुई रक्षणादि क्रिया (शिशुः) और जो अविद्यादि दोषों को छिन्न-भिन्न करे, सबके उपकार करने को अच्छा यत्न (समादत्त) भली-भाँति ग्रहण करे (तम्) उसको (अर्वतीः) बुद्धिमती कन्या (गच्छन्ति) प्राप्त होती (तमित्) और उसीको (जुह्वः) विद्या विज्ञान की ग्रहण करनेवाली कन्या प्राप्त होती हैं ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों ने जो जाना और जो-जो पढ़ा उस-उस की परीक्षा जैसे अपने आप पढ़ानेवाले विद्वान् को देवें वैसे कन्या भी अपनी पढ़ानेवाली को अपने पढ़े हुए की परीक्षा देवें ऐसे करने के विना सत्याऽसत्य का सम्यक् निर्णय होने को योग्य नहीं है ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।