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Rigveda Mandal 1 / Sukta 144 / Mantra 6

191 Sukta
7 Mantra
1/144/6
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं ह्य॑ग्ने दि॒व्यस्य॒ राज॑सि॒ त्वं पार्थि॑वस्य पशु॒पा इ॑व॒ त्मना॑। एनी॑ त ए॒ते बृ॑ह॒ती अ॑भि॒श्रिया॑ हिर॒ण्ययी॒ वक्व॑री ब॒र्हिरा॑शाते ॥

त्वम् । हि । अ॒ग्ने॒ । दि॒व्यस्य॑ । राज॑सि । त्वम् । पार्थि॑वस्य । प॒शु॒पाःऽइ॑व । त्मना॑ । एनी॒ इति॑ । ते॒ । ए॒ते इति॑ । बृ॒ह॒ती इति॑ । अ॒भि॒ऽश्रिया॑ । हि॒र॒ण्ययी॒ इति॑ । वक्व॑री॒ इति॑ । ब॒र्हिः । आ॒शा॒ते॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
त्वं ह्यग्ने दिव्यस्य राजसि त्वं पार्थिवस्य पशुपा इव त्मना। एनी त एते बृहती अभिश्रिया हिरण्ययी वक्वरी बर्हिराशाते ॥

त्वम्। हि। अग्ने। दिव्यस्य। राजसि। त्वम्। पार्थिवस्य। पशुपाःऽइव। त्मना। एनी इति। ते। एते इति। बृहती इति। अभिऽश्रिया। हिरण्ययी इति। वक्वरी इति। बर्हिः। आशाते इति ॥ १.१४४.६

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 6

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Meaning
हे (अग्ने) सूर्य के समान प्रकाशमान विद्वान् ! (त्वं, हि) आप ही (पशुपाइव) पशुओं की पालना करनेवाले के समान (त्मना) अपने से (दिव्यस्य) अन्तरिक्ष में हुई वृष्टि आदि के विज्ञान को (राजसि) प्रकाशित करते वा (त्वम्) आप (पार्थिवस्य) पृथिवी में जाने हुए पदार्थों के विज्ञान का प्रकाश करते हो (एते) ये प्रत्यक्ष (एनी) अपनी अपनी कक्षा में घूमनेवाले (बृहती) अतीव विस्तारयुक्त (अभिश्रिया) सब ओर से शोभायमान (हिरण्ययी) बहुत हिरण्य जिनमें विद्यमान (वक्वरी) प्रशंसित सूर्यमण्डल और भूमण्डल वा (ते) आपके ज्ञान के अनुकूल (बर्हिः) वृद्धि को (आशाते) व्याप्त होते हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ऋद्धि और सिद्धि पूरी लक्ष्मी को करती हैं वैसे आत्मवान् पुरुष परमेश्वर और पृथिवी के राज्य में अच्छे प्रकार प्रकाशित होता जैसे पशुओं का पालनेवाला प्रीति से अपने पशुओं की रक्षा करता है, वैसे सभापति अपने प्रजाजनों की रक्षा करे ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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