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Rigveda Mandal 1 / Sukta 144 / Mantra 5

191 Sukta
7 Mantra
1/144/5
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तमीं॑ हिन्वन्ति धी॒तयो॒ दश॒ व्रिशो॑ दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑ हवामहे। धनो॒रधि॑ प्र॒वत॒ आ स ऋ॑ण्वत्यभि॒व्रज॑द्भिर्व॒युना॒ नवा॑धित ॥

तम् । ई॒म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । धी॒तयः॑ । दश॑ । व्रिशः॑ । दे॒वम् । मर्ता॑सः । ऊ॒तये॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ । धनोः॑ । अधि॑ । प्र॒ऽवतः॑ । आ । सः । ऋ॒ण्व॒ति॒ । अ॒भि॒व्रज॑त्ऽभिः । व॒युना॑ । नवा॑ । अ॒धि॒त॒ ॥

Mantra without Swara
तमीं हिन्वन्ति धीतयो दश व्रिशो देवं मर्तास ऊतये हवामहे। धनोरधि प्रवत आ स ऋण्वत्यभिव्रजद्भिर्वयुना नवाधित ॥

तम्। ईम्। हिन्वन्ति। धीतयः। दश। व्रिशः। देवम्। मर्तासः। ऊतये। हवामहे। धनोः। अधि। प्रऽवतः। आ। सः। ऋण्वति। अभिव्रजत्ऽभिः। वयुना। नवा। अधित ॥ १.१४४.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (मर्त्तासः) मरणधर्मा मनुष्य हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये जिस (देवम्) विद्वान् को (हवामहे) स्वीकार करते वा (दश) दश (धीतयः) हाथ-पैरों की अङ्गुलियों के समान (व्रिशः) प्रजा जिसको (हिन्वन्ति) प्रसन्न करती हैं (तम्, ईम्) उसी को तुम लोग ग्रहण करो, जो धनुर्विद्या का जाननेवाला (धनोः) धनुष के (अधि) ऊपर आरोप कर छोड़े (प्रवतः) जाते हुए वाणों को (अधित) धारण करता अर्थात् उनका सन्धान करता है (सः) वह (अभिव्रजद्भिः) सब ओर से जाते हुए विद्वानों के साथ (नवा) नवीन (वयुना) उत्तम-उत्तम ज्ञानों को (आ, ऋण्वति) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हाथों की अङ्गुलियों से भोजन आदि की क्रिया करने से शरीरादि बढ़ते हैं वैसे विद्वानों के अध्यापन और उपदेशों की क्रिया से प्रजाजन वृद्धि पाते हैं वा जैसे धनुर्वेद का जाननेवाला शत्रुओं को जीतकर रत्नों को प्राप्त होता है वैसे विद्वानों के सङ्ग के फल को जाननेवाला जन उत्तम ज्ञानों को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।