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Rigveda Mandal 1 / Sukta 144 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/144/4
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यमीं॒ द्वा सव॑यसा सप॒र्यत॑: समा॒ने योना॑ मिथु॒ना समो॑कसा। दिवा॒ न नक्तं॑ पलि॒तो युवा॑जनि पु॒रू चर॑न्न॒जरो॒ मानु॑षा यु॒गा ॥

यम् । ई॒म् । द्वा । सऽव॑यसा । स॒प॒र्यतः॑ । स॒मा॒ने । योना॑ । मि॒थु॒ना । सम्ऽओ॑कसा । दिवा॑ । न । नक्त॑म् । प॒लि॒तः । युवा॑ । अ॒ज॒नि॒ । पु॒रु । चर॑न् । अ॒जरः॑ । मानु॑षा । यु॒गा ॥

Mantra without Swara
यमीं द्वा सवयसा सपर्यत: समाने योना मिथुना समोकसा। दिवा न नक्तं पलितो युवाजनि पुरू चरन्नजरो मानुषा युगा ॥

यम्। ईम्। द्वा। सऽवयसा। सपर्यतः। समाने। योना। मिथुना। सम्ऽओकसा। दिवा। न। नक्तम्। पलितः। युवा। अजनि। पुरु। चरन्। अजरः। मानुषा। युगा ॥ १.१४४.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(सवयसा) समान अवस्थायुक्त (द्वा) दो (समान) तुल्य (योना) उत्पत्ति स्थानमें (मिथुना) मैथुन कर्म करनेवाले स्त्री-पुरुष (समोकसा) समान घर के साथ वर्त्तमान (दिवा) दिन (नक्तम्) रात्रि के (न) समान (यम्) जिस (ईम्) प्रत्यक्ष बालक का (सपर्यतः) सेवन करें उसको पालें, वह (अजरः) जरा अवस्थारूपी रोगरहित (मानुषा) मनुष्य सम्बन्धी (युगा) वर्षों को (पुरु) बहुत (चरन्) चलता भोगता हुआ (पलितः) सुपेद बालोंवाला भी हो तो (युवा) ज्वान तरुण अवस्थावाला (अजनि) प्रकट होता है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रीति के साथ वर्त्तमान स्त्री-पुरुष धर्मसम्बन्धी व्यवहार से पुत्र को उत्पन्न कर उसे अच्छी शिक्षा दे शीलवान् कर सुखी करते हैं, वैसे समान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले दो विद्वान् शिष्यों को सुशील करते हैं। वा जैसे दिन, रात्रि के साथ वर्त्तमान भी अपने स्थान में रात्रि को निवृत्त करता है, वैसे अज्ञानियों के साथ वर्त्तमान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले विद्वान् मोह में नहीं लगते हैं। वा जैसे किया है पूरा ब्रह्मचर्य जिन्होंने, वे रूपलावण्य और बलादि गुणों से युक्त सन्तान को उत्पन्न करते हैं, वैसे ये सत्य पढ़ाने और उपदेश करने से सबका पूरा आत्मबल उत्पन्न करते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।