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Rigveda Mandal 1 / Sukta 144 / Mantra 3

191 Sukta
7 Mantra
1/144/3
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
युयू॑षत॒: सव॑यसा॒ तदिद्वपु॑: समा॒नमर्थं॑ वि॒तरि॑त्रता मि॒थः। आदीं॒ भगो॒ न हव्य॒: सम॒स्मदा वोळ्हु॒र्न र॒श्मीन्त्सम॑यंस्त॒ सार॑थिः ॥

युयू॑षतः । सऽव॑यसा । तत् । इत् । वपुः॑ । स॒मा॒नम् । अर्थ॑म् । वि॒ऽतरि॑त्रता । मि॒थः । आद्त् । ईम् । भगः॑ । न । हव्यः॑ । सम् । अ॒स्मत् । आ । वोळ्हुः॑ । न । र॒श्मीन् । सम् । अ॒यं॒स्त॒ । सार॑थिः ॥

Mantra without Swara
युयूषत: सवयसा तदिद्वपु: समानमर्थं वितरित्रता मिथः। आदीं भगो न हव्य: समस्मदा वोळ्हुर्न रश्मीन्त्समयंस्त सारथिः ॥

युयूषतः। सऽवयसा। तत्। इत्। वपुः। समानम्। अर्थम्। विऽतरित्रता। मिथः। आत्। ईम्। भगः। न। हव्यः। सम्। अस्मत्। आ। वोळ्हुः। न। रश्मीन्। सम्। अयंस्त। सारथिः ॥ १.१४४.३

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जब (सवयसा) समान अवस्थावाले दो शिष्य (समानम्) तुल्य (वपुः) स्वरूप को (युयूषतः) मिलाने अर्थात् एक दूसरे की उन्नति करने को चाहते हैं (तदित्) तभी (वितरित्रता) अतीव अनेक प्रकार वे (मिथः) परस्पर (अर्थम्) धनादि पदार्थ की सिद्धि करने की इच्छा करते हैं (आत्) इसके अनन्तर (ईम्) सब ओर से (भगः) ऐश्वर्यवाला पुरुष जैसे (हव्यः) स्वीकार करने योग्य हो (न) वैसे उक्त विद्यार्थियों में से प्रत्येक (सारथिः) सारथी जैसे (वोढुः) पदार्थ पहुँचानेवाले घोड़े आदि की (रश्मीन्) रस्सियों को (न) वैसे (अस्मत्) हम अध्यापक आदि जनों से पढ़ाइयों को (समायंस्त) भली भाँति स्वीकार करता और उपदेशों को (सम्) भली भाँति स्वीकार करता है ॥ ३ ॥
Essence
जो अध्यापक और उपदेशक कपट-छल के विना औरों को अपने तुल्य करने की इच्छा से उन्हें विद्वान् करें, वे उत्तम ऐश्वर्य को पाकर जितेन्द्रिय हों ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।