Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 144 / Mantra 2

191 Sukta
7 Mantra
1/144/2
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒भीमृ॒तस्य॑ दो॒हना॑ अनूषत॒ योनौ॑ दे॒वस्य॒ सद॑ने॒ परी॑वृताः। अ॒पामु॒पस्थे॒ विभृ॑तो॒ यदाव॑स॒दध॑ स्व॒धा अ॑धय॒द्याभि॒रीय॑ते ॥

अ॒भि । ई॒म् । ऋ॒तस्य॑ । दो॒हनाः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । योनौ॑ । दे॒वस्य॑ । सद॑ने । परि॑ऽवृताः । अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । विऽभृ॑तः । यत् । आ । अव॑सत् । अध॑ । स्व॒धाः । अ॒ध॒य॒त् । याभिः॑ । ईय॑ते ॥

Mantra without Swara
अभीमृतस्य दोहना अनूषत योनौ देवस्य सदने परीवृताः। अपामुपस्थे विभृतो यदावसदध स्वधा अधयद्याभिरीयते ॥

अभि। ईम्। ऋतस्य। दोहनाः। अनूषत। योनौ। देवस्य। सदने। परिऽवृताः। अपाम्। उपऽस्थे। विऽभृतः। यत्। आ। अवसत्। अध। स्वधाः। अधयत्। याभिः। ईयते ॥ १.१४४.२

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 2

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (ऋतस्य) सत्य विज्ञान के (दोहनाः) पूरे करनेवाली (परिवृताः) वस्त्रादि से ढपी हुई अर्थात् लज्जावती पण्डिता स्त्रियाँ (देवस्य) विद्वान् के (सदने) स्थान वा (योनौ) घर में (अध्यनूषत) सम्मुख में प्रशंसा करती हैं वा (यत्) जो वायु (अपाम्) जलों के (उपस्थे) समीप में (विभृतः) विशेषता से धारण किया हुआ (आवसत्) अच्छे प्रकार वसे (अध) इसके अनन्तर जैसे विद्वान् (स्वधाः) जलों को (अधयत्) पियें वा (याभिः) जिन क्रियाओं से (ईम्) सब ओर से उनको (ईयते) प्राप्त होता है वैसे उन सभों के समान तुम भी वर्त्तो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे आकाश में जल स्थिर हो और वहाँ से वर्ष कर समस्त जगत् को पुष्ट करता है, वैसे विद्वान् जन चित्त में विद्या को स्थिर कर सब मनुष्यों को पुष्ट करें ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.