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Rigveda Mandal 1 / Sukta 143 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/143/8
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अप्र॑युच्छ॒न्नप्र॑युच्छद्भिरग्ने शि॒वेभि॑र्नः पा॒युभि॑: पाहि श॒ग्मैः। अद॑ब्धेभि॒रदृ॑पितेभिरि॒ष्टेऽनि॑मिषद्भि॒: परि॑ पाहि नो॒ जाः ॥

अप्र॑ऽयुच्छन् । अप्र॑युच्छत्ऽभिः । अ॒ग्ने॒ । शि॒वेभिः॑ । नः॒ । पा॒युऽभिः॑ । पा॒हि॒ । श॒ग्मैः । अद॑ब्धेभिः । अदृ॑पितेभिः । इ॒ष्टे॒ । अनि॑मिषत्ऽभिः । परि॑ । पा॒हि॒ । नः॒ । जाः ॥

Mantra without Swara
अप्रयुच्छन्नप्रयुच्छद्भिरग्ने शिवेभिर्नः पायुभि: पाहि शग्मैः। अदब्धेभिरदृपितेभिरिष्टेऽनिमिषद्भि: परि पाहि नो जाः ॥

अप्रऽयुच्छन्। अप्रयुच्छत्ऽभिः। अग्ने। शिवेभिः। नः। पायुऽभिः। पाहि। शग्मैः। अदब्धेभिः। अदृपितेभिः। इष्टे। अनिमिषत्ऽभिः। परि। पाहि। नः। जाः ॥ १.१४३.८

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 8

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इष्टे) सत्कार करने योग्य तथा (अग्ने) विद्या विज्ञान के प्रकाश से युक्त अग्नि के समान विद्वान् ! आप (अप्रयुच्छन्) प्रमाद को न करते हुए (अप्रयुच्छद्भिः) प्रमादरहित विद्वानों के साथ वा (शिवेभिः) कल्याण करनेवाले (पायुभिः) रक्षक (शग्मैः) सुखप्रापक विद्वानों के साथ (नः) हम लोगों की (पाहि) रक्षा करो तथा (जाः) सुखों की उत्पत्ति करानेवाले आप (अनिमिषद्भिः) निरन्तर आलस्यरहित (अदब्धेभिः) हिंसा और (अदृपितेभिः) मोहादि दोषरहित विद्वानों के साथ (नः) हम लोगों की (परि, पाहि) सब ओर से रक्षा करो ॥ ८ ॥
Essence
मनुष्यों को निरन्तर यह चाहना और ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि धार्मिक विद्वानों के साथ धार्मिक विद्वान् हमारी निरन्तर रक्षा करें ॥ ८ ॥इस सूक्त में विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ की साथ सङ्गति जानना चाहिये ॥यह एकसौ तेंतालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।