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Rigveda Mandal 1 / Sukta 143 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/143/7
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
घृ॒तप्र॑तीकं व ऋ॒तस्य॑ धू॒र्षद॑म॒ग्निं मि॒त्रं न स॑मिधा॒न ऋ॑ञ्जते। इन्धा॑नो अ॒क्रो वि॒दथे॑षु॒ दीद्य॑च्छु॒क्रव॑र्णा॒मुदु॑ नो यंसते॒ धिय॑म् ॥

घृ॒तऽप्र॑तीकम् । वः॒ । ऋ॒तस्य॑ । धूः॒ऽसद॑म् । अ॒ग्निम् । मि॒त्रम् । न । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । ऋ॒ञ्ज॒ते॒ । इन्धा॑नः । अ॒क्रः । वि॒दथे॑षु । दीद्य॑त् । शु॒क्रऽव॑र्णाम् । उत् । ऊँ॒ इति॑ । नः॒ । यं॒स॒ते॒ । धिय॑म् ॥

Mantra without Swara
घृतप्रतीकं व ऋतस्य धूर्षदमग्निं मित्रं न समिधान ऋञ्जते। इन्धानो अक्रो विदथेषु दीद्यच्छुक्रवर्णामुदु नो यंसते धियम् ॥

घृतऽप्रतीकम्। वः। ऋतस्य। धूःऽसदम्। अग्निम्। मित्रम्। न। सम्ऽइधानः। ऋञ्जते। इन्धानः। अक्रः। विदथेषु। दीद्यत्। शुक्रऽवर्णाम्। उत्। ऊँ इति। नः। यंसते। धियम् ॥ १.१४३.७

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 7

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (समिधानः) अच्छे प्रकार प्रकाशमान विद्वान् (वः) तुम्हारे लिये (धूर्षदम्) हिंसकों में स्थिर होते हुए (घृतप्रतीकम्) जो घृत को प्राप्त होता उस (अग्निम्) आग को (ऋतस्य) सत्य व्यवहार के वर्त्तनेवाले (मित्रम्) मित्र के (न) समान (ऋञ्जते) प्रसिद्ध करता है (उ) और जो (इन्धानः) प्रकाशमान होता हुआ वा (अक्रः) औरों ने जिसको न दबा पाया वह (विदथेषु) संग्रामों में (दीद्यत्) निरन्तर प्रकाशित होता हुआ (नः) हम लोगों की (शुक्रवर्णाम्) शुद्धस्वरूप (धियम्) प्रज्ञा को (उद्यंसते) उत्तम रखता है उसको तुम हम पिता के समान सेवें ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बिजुली के समान समस्त शुभ गुणों की खान, मित्र के समान सुख का देने, संग्रामों में वीर के तुल्य शत्रुओं को जीतने और दुःख का विनाश करनेवाला है, उस विद्वान् का आश्रय कर सब मनुष्य विद्याओं को प्राप्त होवें ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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