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Rigveda Mandal 1 / Sukta 143 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/143/5
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
न यो वरा॑य म॒रुता॑मिव स्व॒नः सेने॑व सृ॒ष्टा दि॒व्या यथा॒शनि॑:। अ॒ग्निर्जम्भै॑स्तिगि॒तैर॑त्ति॒ भर्व॑ति यो॒धो न शत्रू॒न्त्स वना॒ न्यृ॑ञ्जते ॥

न । यः । वरा॑य । म॒रुता॑म्ऽइव । स्व॒नः । सेना॑ऽइव । सृ॒ष्टा । दि॒व्या । यथा॑ । अ॒शनिः॑ । अ॒ग्निः । जम्भैः॑ । ति॒गि॒तैः । अ॒त्ति॒ । भर्व॑ति । न । शत्रू॑न् । सः । वना॑ । नि । ऋ॒ञ्ज॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
न यो वराय मरुतामिव स्वनः सेनेव सृष्टा दिव्या यथाशनि:। अग्निर्जम्भैस्तिगितैरत्ति भर्वति योधो न शत्रून्त्स वना न्यृञ्जते ॥

न। यः। वराय। मरुताम्ऽइव। स्वनः। सेनाऽइव। सृष्टा। दिव्या। यथा। अशनिः। अग्निः। जम्भैः। तिगितैः। अत्ति। भर्वति। न। शत्रून्। सः। वना। नि। ऋञ्जते ॥ १.१४३.५

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 5

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Meaning
(यः) जो (अग्निः) आग (मरुतामिव) पवन वा विद्वानों के (स्वनः) शब्द के समान (सृष्टा, सेनेव) शत्रुदल में चक्रव्यूहादि रचना से रची हुई सेना के समान वा (यथा) जैसे (दिव्या) कारण वा वायु आदि कार्य द्रव्य में उत्पन्न हुई (अशनिः) बिजुली के वैसे (वराय) स्वीकार करने के लिये (न) नहीं हो सकता अर्थात् तेजी के कारण रुक नहीं सकता (सः) वह (तिगितैः) तीक्ष्ण (जम्भैः) स्फूर्तियों से (अत्ति) भक्षण करता अर्थात् लकड़ी आदि को खाता है (योधः) योधा के (न) समान (शत्रून्) शत्रुओं को (भर्वति) नष्ट करता अर्थात् धनुर्विद्या में प्रविष्ट किया हुआ शत्रुदल को भूँजता है और (वना) वनों को (नि, ऋञ्जते) निरन्तर सिद्ध करता है ॥ ५ ॥
Essence
प्रचण्ड वायु से प्रेरित अति जलता हुआ अग्नि शत्रुओं को मारने के तुल्य पदार्थों को जलाता है, वह सहसा नहीं रुक सकता ॥ ५ ॥
Subject
अब विद्वान् के विषय में कहा है ।

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