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Rigveda Mandal 1 / Sukta 143 / Mantra 4

191 Sukta
8 Mantra
1/143/4
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यमे॑रि॒रे भृग॑वो वि॒श्ववे॑दसं॒ नाभा॑ पृथि॒व्या भुव॑नस्य म॒ज्मना॑। अ॒ग्निं तं गी॒र्भिर्हि॑नुहि॒ स्व आ दमे॒ य एको॒ वस्वो॒ वरु॑णो॒ न राज॑ति ॥

यम् । आ॒ऽई॒रि॒रे॒ । भृग॑वः । वि॒श्वऽवे॑दसम् । नाभा॑ । पृ॒थि॒व्याः । भुव॑नस्य । म॒ज्मना॑ । अ॒ग्निम् । तम् । गीः॒ऽभिः । हि॒नु॒हि॒ । स्वे । आ । दमे॑ । यः । एकः॑ । वस्वः॑ । वरु॑णः । न । राज॑ति ॥

Mantra without Swara
यमेरिरे भृगवो विश्ववेदसं नाभा पृथिव्या भुवनस्य मज्मना। अग्निं तं गीर्भिर्हिनुहि स्व आ दमे य एको वस्वो वरुणो न राजति ॥

यम्। आऽईरिरे। भृगवः। विश्वऽवेदसम्। नाभा। पृथिव्याः। भुवनस्य। मज्मना। अग्निम्। तम्। गीःऽभिः। हिनुहि। स्वे। आ। दमे। यः। एकः। वस्वः। वरुणः। न। राजति ॥ १.१४३.४

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे जिज्ञासु पुरुष ! (यम्) जिस (विश्ववेदसम्) अच्छे संसार के वेत्ता परमात्मा को (भृगवः) विद्या से अविद्या को भूँजनेवाले (एरिरे) सब ओर से जाने वा (यः) जो (एकः) एक अति श्रेष्ठ आप्त ईश्वर (मज्मना) अत्यन्त बल से (वरुणः) अति श्रेष्ठ के (न) समान (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष के वा (भुवनस्य) लोक में उत्पन्न हुए (वस्वः) धनरूप पदार्थ के (नाभा) बीच में अपनी व्याप्ति से (राजति) प्रकाशमान है (तम्) उस (अग्निम्) सूर्य के समान ईश्वर जो कि (स्वे) अपने अर्थात् तेरे (दमे) घररूप हृदयाकाश में वर्त्तमान है उसको (गीर्भिः) प्रशंसित वाणियों से (आ, हिनुहि) जानो ॥ ४ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो विद्वानों से जानने योग्य सब में सब प्रकार व्याप्त प्रशंसा के योग्य सच्चिदानन्दादि लक्षण सर्वशक्तिमान् अद्वितीय अति-सूक्ष्म आप ही प्रकाशमान अन्तर्यामी परमेश्वर है, उसको योग के अङ्गों के अनुष्ठान की सिद्धि से अपने हृदय में जानो ॥ ४ ॥
Subject
फिर ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।