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Rigveda Mandal 1 / Sukta 143 / Mantra 1

191 Sukta
8 Mantra
1/143/1
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र तव्य॑सीं॒ नव्य॑सीं धी॒तिम॒ग्नये॑ वा॒चो म॒तिं सह॑सः सू॒नवे॑ भरे। अ॒पां नपा॒द्यो वसु॑भिः स॒ह प्रि॒यो होता॑ पृथि॒व्यां न्यसी॑ददृ॒त्विय॑: ॥

प्र । तव्य॑सीम् । नव्य॑सीम् । धी॒तिम् । अ॒ग्नये॑ । वा॒चः । म॒तिम् । सह॑सः । सू॒नवे॑ । भ॒रे॒ । अ॒पाम् । नपा॑त् । यः । वसु॑ऽभिः । स॒ह । प्रि॒यः । होता॑ । पृ॒थि॒व्याम् । नि । असी॑दत् । ऋ॒त्वियः॑ ॥

Mantra without Swara
प्र तव्यसीं नव्यसीं धीतिमग्नये वाचो मतिं सहसः सूनवे भरे। अपां नपाद्यो वसुभिः सह प्रियो होता पृथिव्यां न्यसीददृत्विय: ॥

प्र। तव्यसीम्। नव्यसीम्। धीतिम्। अग्नये। वाचः। मतिम्। सहसः। सूनवे। भरे। अपाम्। नपात्। यः। वसुऽभिः। सह। प्रियः। होता। पृथिव्याम्। नि। असीदत्। ऋत्वियः ॥ १.१४३.१

Ashtak » 2 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 1

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Meaning
मैं (अपां, नपात्) जलों के बीच (यः) जो न गिरता वह सूर्य (पृथिव्याम्) पृथिवी पर जैसे वैसे जो (वसुभिः) प्रथम कक्षा के विद्वानों के (सह) साथ (प्रियः) प्रीतियुक्त (होता) ग्रहण करनेवाला (ऋत्वियः) ऋतुओं की योग्यता रखता हुआ (नि, असीदत्) निरन्तर स्थिर होता है उस (सहसः) शरीर और आत्मा के बलयुक्त अध्यापक के सकाश से (अग्नये) अग्नि के समान तीक्ष्णबुद्धि (सूनवे) पुत्र वा शिष्य के लिये (वाचः) वाणी की (तव्यसीम्) अत्यन्त बलवती (नव्यसीम्) अतीव नवीन (धीतिम्) जिससे विजय को धारण करें उस धारणा और (मतिम्) उत्तम बुद्धि को (प्र, भरे) अच्छे प्रकार धारण करता हूँ ॥ १ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों की योग्यता है कि जैसे सूर्य जलों की धारणा करनेवाला है, वैसे पवित्र बुद्धिमान् प्रिय आचरण करने और शीघ्र विद्याओं को ग्रहण करनेवाले विद्यार्थियों को लेकर विद्या का विज्ञान शीघ्र उत्पन्न करावें ॥ १ ॥
Subject
अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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